प्रियंका वाड्रा की राजनीति…

भारत समान, पूजा सिंह – उन्हें राजनीति में संकट मोचक के तौर पर लाया गया है। कांग्रेस ने प्रियंका गांधी से सबसे बड़ी उम्मीद यही बांधी है कि वह पार्टी को उस वैभव काल में वापस ले जाने का काम करेंगी, जो फिलहाल या तो पुरानी पीढ़ी के लोगों की यादों में है या फिर इतिहास की किताबों में दर्ज है। सोमवार को जब प्रियंका गांधी अपने पहले जमीनी चुनावी अभियान के लिए निकलीं, तो प्रयागराज में इसकी शुरुआत संकट मोचक कहे जाने वाले भगवान हनुमान के मंदिर से ही हुई। अपने पहले अभियान में वह गंगा यात्रा कर रही हैं। वह संगम से गंगा की यात्रा शुरू करके वाराणसी के अस्सी घाट तक जाएंगी।
इस मौके पर उन्होंने गंगा की बात भी की और गंगा-जमुनी तहजीब की भी। ऐसा कहकर वह उस पूरे क्षेत्र से रूबरू थीं, जो कभी कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ था। कांग्रेस ने देश को जितने प्रधानमंत्री दिए, उनमें से ज्यादातर इसी इलाके से देश की संसद में पहुंचे थे। लेकिन अब दो-तीन लोकसभा क्षेत्रों को छोड़ दें, तो शायद कांग्रेस सबसे ज्यादा कमजोर भी यहीं दिख रही है। इस यात्रा के दौरान प्रियंका विभिन्न मंदिरों के दर्शन भी करेंगी और शहीदों के परिवारों से भी मिलेंगी। प्रियंका गांधी की यह पहली चुनावी यात्रा उस वाराणसी में खत्म हो रही है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निर्वाचन क्षेत्र है। अभी तक जो भी विश्लेषण सामने आए हैं, वे यही बताते हैं, उनकी स्थिति वहां काफी मजबूत है। नतीजा जो हो, पहले ही अभियान में प्रियंका गांधी सबसे कठिन चुनौती से मुखातिब हैं।
वैसे ज्यादातर खबरों में यही बताया जा रहा है कि प्रियंका गांधी देश भर में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी, लेकिन उन्हें जो सबसे बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है, वह है पूर्वी उत्तर प्रदेश में पार्टी के अभियान का नेतृत्व करना। यानी उनके जिम्मे जो 40 सीटें हैं, उनमें से ज्यादातर में पार्टी को काफी पापड़ बेलने होंगे। वह भी तब, जब कांग्रेस बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के विपक्षी गठजोड़ से पूरी तरह अलग-थलग हो चुकी है। सोमवार को जब प्रियंका गांधी ने अपना यह अभियान शुरू किया, तब तक बसपा नेता मायावती का वह ट्वीट भी जगजाहिर हो चुका था, जिसमें उन्होंने कहा था कि कांग्रेस प्रदेश की सभी 80 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए स्वतंत्र है। इसका आशय स्पष्ट था कि अब उनकी पार्टी का कांग्रेस के कोई गठजोड़ नहीं है। चुनौती कितनी कठिन है, इसे प्रियंका गांधी भी अच्छी तरह समझ रही होंगी।
अभी तक प्रियंका गांधी का जो कार्यक्रम सामने आया है, उसके अनुसार वह विभिन्न तबकों के लोगों से मिलने के साथ ही खास तौर से युवा वर्ग से भी मिलेंगी। युवा वर्ग को पार्टी से जोड़े बिना किसी भी राजनीतिक दल का उद्धार संभव नहीं है। हालांकि प्रियंका गांधी और कांग्रेस ही नहीं, पूरे विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती इस समय कुछ और है। पुलवामा और उसके बाद हुई सर्जिकल स्ट्राइक से भाजपा सक्रिय राष्ट्रवाद का एक नैरेटिव पूरे देश को देने में कामयाब रही है। आम चुनाव की शुरुआत में हम जहां खड़े हैं, वहां विपक्ष की दिक्कत यह है कि उसका कोई मजबूत जवाबी नैरेटिव फिलहाल जोर पकड़ता नहीं दिख रहा। विपक्षी दलों की सफलता की कुंजी अब इस बात में ही निहित है कि वे चुनाव अभियान के दौरान कोई ऐसा नया नैरेटिव खड़ा करें, जो लोगों को आंदोलित करे। यही चुनौती प्रियंका गांधी के सामने भी है, पूरे देश में भी और पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here