प्रधान संपादक की कलम से…

मां की ममतामई आंखें उनका स्नेह जो मुझे बचपन से ही कुछ अलग तरीके से निहारता था लाजमी था क्योंकि मैं सभी भाइयों में सबसे छोटा था,मुझसे दूर रहती थी किंतु सबसे करीब तभी तो समाज के तमाम झंझावतो से लड़ने की प्रेरणा के साथ मुझे एक असीम आत्मविश्वास प्रदान करती थी, समाज के सबसे कमजोर तबके के लोगों की आवाज बनने की शक्ति भी मुझे मां से ही मिली थी मेरे मस्तिष्क में निडर व अदम्य साहस की परिपूर्णता थी मां, अंतिम दिनों में बेहद सौभाग्यशाली था मां की चरणों की सेवा करने का अवसर मिला किंतु वह भी क्षणिक था तबीयत जब ज्यादा नासाज होने लगी तो बड़े भ्राता ने उन्हें रांची स्थित RIMS सेंटर में इलाज हेतु भर्ती कराया था।

आज मेरा जन्मदिन था सुबह 10:00 बजे बड़े भैया ने कहा मां की तबीयत ठीक है फिर अचानक, खबर मां के चले जाने की थी जिनसे मेरा पूरा संसार जुड़ा हुआ था शायद अब कभी जन्मदिन ना मनाऊं, मां की दी हुई शक्ति ने मेरे आंसुओं पर भी विराम लगा दिया है किंतु कण-कण से एक आवाज आ रही है बेटा तू आगे बढ़ मैं कण कण से दुआ देती रहूंगी कभी भी हिम्मत मत हारना क्योंकि तुझे आगे बढ़ना ही नहीं है सिर्फ समाज में बदलाव लाना भी है।

हे मां तुझे कोटि-कोटि प्रणाम

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