भारत के 7 पड़ोसी देश: मुस्लिम दिन दूने रात चौगुने, कट्टरपंथ का बोलबाला; बाकी संप्रदाय की हालत दिनोंदिन बदतर

एक संस्था है। नाम है सेंटर फॉर डेमोक्रेसी प्लूरेलिज़्म एंड ह्यूमन राइट्स। अंग्रेजी में CENTER FOR DEMOCRACY PLURALISM AND HUMAN RIGHTS यानी CDPHR। संस्था ने भारत के 7 पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति और मानवाधिकार को लेकर रिपोर्ट जारी की है।

ये देश हैं: पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, श्रीलंका, तिब्बत, मलेशिया और इंडोनेशिया। यह रिपोर्ट वकील, जज, पत्रकारों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों की टीम ने तैयार की है। नागरिक समानता, गरिमा, न्याय और लोकतंत्र की स्थिति के आधार पर इसे तैयार किया गया है।

रिपोर्ट में भारत के पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों की वर्तमान स्थिति का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसके मुताबिक अल्पसंख्यकों की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक हालत एकदम खस्ता है। इन देशों में अल्पसंख्यक की महिलाओं के साथ रेप, मर्डर जैसी घटनाएँ आए दिन सामने आती रहती हैं।

एक-एक कर जानते हैं कि किस देश में अल्पसंख्यकों की स्थिति कैसी है।

बांग्लादेश

भारत का पड़ोसी देश बांग्लादेश जब 1971 में बना था, तब ये एक सेक्युलर राष्ट्र था। लेकिन, 1975 में वहाँ की सरकार ने संविधान से धर्मनिपेक्ष शब्द को हटाकर उसमें कुरान की आयतों को शामिल कर दिया। इसी के साथ ये एक मुस्लिम देश बन गया। यहाँ इस्लामिस्ट अतिवादी हर दिन धार्मिक अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करते हैं।

ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अबुल बरकत की रिपोर्ट के मुताबिक, बीते 4 दशकों में 2,30,612 लोगों ने यहाँ से पलायन किया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पलायन की अगर यही स्थिति रही तो अगले 30 साल में यहाँ कोई भी हिंदू बचेगा ही नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया बांग्लादेश की यात्रा के बाद वहाँ हिफाजत-ए-इस्लाम ने मंदिरों को निशाना बनाया था।

बांग्लादेश में गठन के समय 1971 में बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ था। आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक, वह मानवीय इतिहास का सबसे डरावना समय था। करीब 30 लाख लोगों का नरसंहार हुआ था और 2 लाख महिलाओं के साथ रेप किया था। लेकिन, इस पर पाकिस्तान ने कभी खुलकर बात नहीं की। जस्टिस हुमुदूर रहमान के नेतृत्व में 1972 में एक फैक्ट फाइडिंग कमेटी बनाई गई थी। इसकी एक कॉपी पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को सौंपी गई थी, जिसे तुरंत ही नष्ट कर दिया गया था। 21 अगस्त 2000 को इंडिया टुडे में यह रिपोर्ट छपी थी।

इस नरसंहार के बाद बांग्लादेश में सेक्युलरिज्म का उदय हुआ। लेकिन, कट्टरपंथियों के राजनीति में पैठ बनाने के बाद 1977 में संविधान से सेक्युलरिज्म को हटाकर उसमें इस्लाम को प्राथमिकता दी गई। 1988 में इस्लाम बांग्लादेश का मुख्य धर्म बन गया।

आर्थिक सेक्टर में भी यहाँ अल्पसंख्यकों को कोई सुविधा नहीं है। देश में 11 बैंक काम कर रहे हैं, जिनमें 100 फीसदी शरिया है। चिटगोंग हिल ट्रैक्ट एकमात्र ऐसा क्षेत्र है, जहाँ 1951 में 90 फासदी बुद्धिस्ट आबादी थी। हिंदू अल्पसंख्यक लंबे समय से पीड़ित रहे हैं। यहाँ बंगालियों की संख्या ज्यादा है। चिटगोंग क्षेत्र में भी करीब 55 फीसदी इस्लामिक आबादी है। स्टडीज के मुताबिक 1951 में हिंदुओं की आबादी 23% थी, जो 2017 में घटकर 9 फीसदी रह गई थी।

रिपोर्ट के मुताबिक 1951 में बांग्लादेश में मुस्लिम आबादी 76.85% थी, जो बढ़कर 2011 में 90.39% हो गई है। दूसरी ओर हिंदू, बुद्धिस्ट, सिख और जैन धर्म की जनसंख्या उसी पीरियड में 22.89% से घटकर 9.30% हो गई है। CDPHR मुताबिक, “यही वो समय है जब अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार जैसी वैश्विक एजेंसी को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए।”

इसमें बताया गया है 2003 में अल्पसंख्यक महिलाओं और बच्चों के उत्पीड़न को रोकने के लिए लाए गए एक्ट को सही तरीके से लागू नहीं किया गया है। बांग्लादेश यूएन के शांति स्थापना मिशन में सबसे ज्यादा 6731 सैनिकों का योगदान देता है, ताकि दुनिया में शांति स्थापित की जा सके। लेकिन, उसके अपने देश में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहे हैं। 1946 में यहाँ पहला हिंदू विरोधी दंगा हुआ था। इसके बाद 1971 में नरसंहार हुआ था। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आवामी लीग की सरकार आर्थिक मोर्चे इस्लामिक बैंकिग के जरिए कट्टरता फैला रही है।

वहाँ दो तरह के कुआमी और आलिया मदरसा चलते हैं, जिनका मकसद इस्लामिक शिक्षा को आगे बढ़ाना है। कुआमी में कुरान, हदीस, इस्लामिक लॉ, इस्लामिक संस्कृति आदि के बारे में पढ़ाया जाता है, जबकि आलिया मदरसा में दूसरे विषय भी पढ़ाए जाते हैं। 1950 में यहाँ 4430 मदरसा थे, जिनकी संख्या बढ़कर 54,130 हो गई है। बांग्लादेश शैक्षिक सूचना और सांख्यिकी-2008 के डाटा के अनुसार, 39,612 कुआमी मदरसों में 52,47,600 विद्यार्थी रजिस्टर्ड थे। वहीं 14,152 आलिया मदरसों में 4,58,0082 छात्र थे। बांग्लादेशी इस्लामिक आंतकी संगठन JMB देश में सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सिनेमा घरों का विरोध करता है। “लज्जा” उपन्यास की लेखिका तसलीमा नसरीन के खिलाफ 1992 में फतवा जारी किया गया था।

पाकिस्तान
पाकिस्तान मुस्लिम राष्ट्र है, लेकिन वहाँ खुद मुसलमान ही सुरक्षित नहीं हैं। पाकिस्तान में शिया और अहमदिया मुसलमानों के कुरान पढ़ने पर भी रोक है। यहाँ सुन्नी मुसलमानों की अधिकता है। वहाँ धार्मिक अल्पसंख्यकों हिंदू, सिख और ईसाइयों की हालत बहुत ही खराब है। अल्पसंख्यक युवतियों के साथ बलात्कार, अपहरण और मारपीट की घटनाएँ तो आम हैं। अल्पसंख्यकों को डरा-धमकाकर जबरन धर्मांतरण कराया जाता है।

रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में हिंदुओं पर एट्रोसिटी एक्ट लगाकर उन्हें जबरन जेलों में ठूँस दिया जाता है। वहाँ के धार्मिक अल्पसंख्यक सुन्नी मुसलमानों की असहिष्णुता के सताए हैं। पाकिस्तान में आज भी 1950 जैसै हालात हैं। आजादी के वक़्त पाकिस्तान में हिंदुओं के सबसे बड़े नेता रहे जोगेंद्रनाथ मंडल ने हिंदुओं के खिलाफ एट्रोसिटी के बारे पाकिस्तान की सरकार और वहाँ के प्रधानमंत्री को सूचित किया था।

उन्होंने इस बात का खुलासा किया था कि पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में हिंदुओं पर अत्याचार बढ़ रहा है। ढाका में 10 फरवरी 1950 को 10,000 हिंदुओं का कत्लेआम किया गया था। मंडल ने एक पत्र में खुलासा किया था कि पाकिस्तान के सिंध और कराची में दलित हिंदू बहुत ही बुरी स्थिति में हैं। सुन्नी मुसलमानों ने 363 हिंदू मंदिरों और गुरुद्वारों को बूचड़खाने में बदल दिया था।

एक अन्य व्यक्ति जो पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों को सामने लाए वो फरहनाज इसपहानी हैं, जिन्होंने पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों से ज्यादती को उजागर किया था। 1977-1980 के दौरान पाकिस्तान के तीसरे मिलिट्री जनरल रहे जिया-उल-हक ने पाकिस्तान के इस्लामीकरण की नीति को लागू किया था। 1998 की जनगणना के मुताबिक पाकिस्तान में हिंदू केवल 1.6 फीसदी और ईसाई 1.59 प्रतिशत थे। एशियन ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक, “पाकिस्तान के सिंधु प्रांत में हर महीने 20-25 अपहरण होते हैं और हिंदू लड़कियों का धर्म परिवर्तन कराया जाता है।”

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की रहने वाली आसिया बीबी पहली अल्पसंख्यक क्रिश्चियन महिला थी, जिसे देश द्रोह के केस में फाँसी की सजा हुई थी। 2010 में इस्लामी चरमपंथी भीड़ ने देशद्रोह का आरोप लगाकर पंजाब प्रांत में 7 ईसाइयों को जिंदा जला दिया था। इस हमले में 18 लोग घायल हुए थे और 50 घरों को आग लगा दी गई थी। लाहौर में 2013 में पुलिस के सामने 40 ईसाई घरों को जला दिया गया था। वहाँ शियाओं पर हमले बढ़े हैं, लेकिन मीडिया उसे क्षेत्रवाद की लड़ाई बता रहा है।

पाकिस्तान नेशनल असेंबली की मेंबर फरहनाज इसाफानी का कहना है कि भारत-पाकिस्तान बँटवारे के साथ ही अल्पसंख्यकों पर अत्याचार शुरू हो गया था। अल्पसंख्यकों पर हमला करने वालों के तालिबान और कट्टरपंथियों के साथ सीधे संबंध हैं। शिया और अहमदिया मुसलमान, जिन्हें आधिकारिक तौर पर मुसलमान मानने से इंकार किया गया है। इन सभी को सुसाइड बॉम्ब के जरिए टार्गेट किया जा रहा है।

अमेरिका की ;पाकिस्तान में धार्मिक आजादी’ 2010 की रिपोर्ट के मुताबिक, “धार्मिक अल्पसंख्यकों पर प्रति हिंसा में प्रशासनिक असफलता सबसे बड़ा कारण रहा है। धार्मिक हमलों में हमलावर ऊपरी दवाबों के कारण जल्दी ही छूट जाया करते थे।”

अफगानिस्तान
CDPHR की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के पड़ोसी देश अफगानिस्तान में मानवाधिकार की हालत भी बहुत खराब है। यहाँ अल्पसंख्यकों के साथ दोहरा व्यवहार किया जाता है। यह इस बात की गवाही है कि 1970 की जनसंख्या के मुताबिक अफगानिस्तान में हिंदू और सिखों की संख्या करीब 7 लाख थी। अब केवल 200 हिंदू और सिख परिवार रह गए हैं। यहाँ के संविधान में ही लिखा है कि केवल मुस्लिम व्यक्ति ही देश का राष्ट्रपति अथवा प्रधानमंत्री बन सकता है। इसके अलावा अधिकारियों को केवल इस्लामिक सिद्धांतों को ही मानना पड़ेगा।

CDPHR की अध्यक्ष डॉ. प्रेरणा मल्होत्रा के मुताबिक, “अफगानिस्तान में सामाजिक और राजनीतिक कट्टरता बढ़ी है। संवैधानिक दृष्टि से इस देश में केवल मुसलमानों को ही जगह दी गई है, जबकि गैर मुस्लिमों से ऐसे पेश आया जाता है कि जैसे वो उस देश का नागरिक ही न हो।”

90 के दशक में तालिबान का फैलाव अफगानिस्तान में हुआ। इसके बाद देश में बड़े पैमाने पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार बढ़ा और लोगों ने पलायन करना शुरू कर दिया। 2016 में वहाँ हिंदुओं और सिखों की संख्या करीब 3000 थी। यह 2020 में घटकर करीब 900 रह गई है।

अफगानिस्तान की कोर्ट में भी अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव किया जाता है। न्याय करने से पहले यह देखा जाता है कि अभियुक्त का धर्म कौन सा है। ‘धार्मिक स्वतंत्रता की आजादी’ पर अमेरिकी आयोग की 2017 की रिपोर्ट में लिखा है, “एक गैर मुस्लिम को कोर्ट कानूनी सहायता तक उपलब्ध नहीं कराता है।”

तिब्बत
तिब्बत के बारे में समूची दुनिया जानती है कि चीन तिब्बतियों के मानवाधिकार को बलपूर्वक किस प्रकार से कुचल रहा है। वह तिब्बती बौद्धों की सामाजिक, आर्थिक, भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को खत्म करने की कोशिश कर रहा है। हालाँकि उसने ये कभी स्वीकार नहीं किया। चीन ने चांबो के युद्ध में 1951 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया था।

इतिहासकारों के मुताबिक माओजेडॉंग ने सत्ता में आने के लिए तिब्बत पर हमला करने की योजना तैयार की थी। 13वें दलाई लामा ने अपनी कैबिनेट में ये घोषणा की थी कि तिब्बत एक स्वतंत्र राष्ट्र है। 1959 में तिब्बत के लोगों ने चीन के खिलाफ प्रदर्शन किया। जिसके बाद चीन में नरसंहार करते हुए वहाँ हजारों लोगों को मार दिया। इसके बाद 80 हजार तिब्बतियों के साथ दलाई लामा इंडिया चले आए। केंद्रीय योजना आयोग की तिब्बतियन प्रशासन पर 2009 की रिपोर्ट के मुताबिक, “भारत में 94,203 तिब्बती रहते हैं।”

मलेशिया
मलेशिया में भूमिपुत्रों की आबादी कुल जनसंख्या की 69 फीसदी है। इनमें से 51 प्रतिशत मलय समुदाय से हैं। इसके अलावा बोर्नियन और भारतवंशियों की आबादी 17 फीसदी है। 2018 के मलेशिया सांख्यिकी विभाग के मुताबिक, मलेशियन चाइनीज 23 और मलेशियन हिंदू वहाँ केवल 7 फीसदी हैं। मलय मुस्लिमों के समर्थन से बीते कुछ सालों में मलेशिया कट्टर इस्लामीकरण की ओर बढ़ा है। बीते 3 दशक में अब्दुल्ला बडावी के शासनकाल से नजीब रज्जाक और महातिर मुहम्मद (2018-2020) के दौरान मलेशिया में इस्लामिक चरमपंथ बढ़ा है।

यहाँ की स्टेट पॉलिसी के मुताबिक मलेशिया ‘भूमिपुत्र’ की नीति का अनुसरण करता है। इसे वहाँ के दूसरे प्रधानमंत्री अब्दुल रज्जाक हुसैन ने 1970 में लागू किया था। 8 अगस्त 2019 में विवादित इस्लामिक वक्ता जाकिर नाइक ने मलेशिया में अल्पसंख्यक चीनी और भारतीय मलेशियन को ‘मेहमान’ कहा था।

मलेशिया के कोटाबारू में एक सभा में उसने कहा था, “लोग मुझे मेहमान कहते हैं, लेकिन मुझसे पहले तो चीनी मेहमान हैं। वो यहाँ पैदा नहीं हुए। अगर आप चाहते हैं कि नया मेहमान वापस जाए तो पहले पुराने को यहाँ से निकालिए। इसके बाद ही मलेशिया पूरी तरह से इस्लामिक राष्ट्र होगा।”

जाकिर नाइक ने आगे कहा था कि मलेशिया के अल्पसंख्यक हिंदुस्तान के अल्पसंख्यकों से 100 गुना ज्यादा स्वतंत्र हैं। CDPHR की रिपोर्ट के मुताबिक, “नाइक ने अकेले ही मलेशिया के अल्पसंख्यकों का उतना नुकसान कर दिया, जितना कोई अन्य नहीं कर सका।”

1954-2018 तक मलेशियन इंडियन कॉन्ग्रेस सत्ता में रही, लेकिन इसने अपने वादे नहीं पूरे किए। उल्टे भारतीय समुदाय पर भ्रष्टाचार परिवारवाद, दो समुदायों को लड़ाकर राजनीति करने के आरोप इस पर लगे।

श्रीलंका
श्रीलंका में तमिलों की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। CDPHR की रिपोर्ट के मुताबिक वहाँ मानवाधिकार और धार्मिक अल्पसंख्यकों की हालत खराब है। 26 साल तक चले गृह युद्ध के कारण वहाँ एक लाख लोग मारे गए थे, जबकि 20,000 तमिल गायब हो गए हैं।

इसकी शुरुआत 1956 से हुई। जब श्रीलंकाई तमिलों के खिलाफ पहला दंगा हुआ। इसके बाद क्रमश: 1958, 1971,1977, 1981 और 1983 में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे हुए। 1983 का दंगा बहुत बड़ा अंतरराष्ट्रीय मुद्दा भी बन गया था, क्योंकि उसमें बड़े पैमाने पर हिंसा और मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ था।

इंडोनेशिया
दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देश इंडोनेशिया में बीते कुछ वर्षों में धार्मिक कट्टरता का स्वरूप भयावह हुआ है। यहाँ पर इस्लामी चरमपंथियों का आतंक बढ़ा है। यहाँ 88% मुस्लिम ही हैं, जो कि पूरी दुनिया की मुस्लिम आबादी का 12.5 फीसदी हैं। 2010 की जनगणना के मुताबिक, इंडोनेशिया में 6 प्रतिशत प्रोटेस्टेंट, 3 फीसदी रोमन कैथोलिक, 2 फीसदी हिंदू, 1 फीसदी बौद्ध, 1 प्रतिशत कंफ्यूशियस और एक फीसदी अन्य हैं।

1945 में स्वतंत्र होने के बाद इंडोनेशिया में मसयूमी पार्टी सत्ता में आई, जो देश की सबसे बड़ी इस्लामिक पार्टी थी। इसने कम्युनिस्टों का देश से सफाया करने के नाम पर 1965-1966 तक बाली और जावा में चीनी और हिंदुओं का जमकर नरसंहार किया। यह नरसंहार कोई तात्कालिक तौर पर होने वाली घटना नहीं, बल्कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की साजिश के तहत लंबे समय में इसे अंजाम दिया गया। इस्लाम के नाम पर यहाँ देशद्रोह का कानून लाया गया। इसके तहत गैर मुस्लिम समुदाय को टारगेट किया जाता है।

73 फीसदी की तेजी से बढ़ रहा इस्लाम
अमेरिका की शोध संस्था प्यू रिसर्च के एक शोध के मुताबिक दुनिया में जहाँ हिंदू-ईसाइयों की जनसंख्या 34-35 फीसदी की तेजी से बढ़ रही है और बौद्ध मतावलंबियों की संख्या 0.3 प्रतिशत की तेजी से घट रही है। वहीं इस्लाम तेजी से अपने पाँव पसार रहा है। मुस्लिमों की आबादी 73 प्रतिशत की तेजी से बढ़ रही है। यह दुनिया की जरूरत से 150 फीसदी अधिक है।

संस्था के मुताबिक, “अगले 30 सालों में दुनिया की आबादी बढ़कर 930 करोड़ के करीब हो जाएगी। मुस्लिमों की आबादी 3.1 फीसदी की दर से बढ़ रही है, जबकि समाज शास्त्रियों के मुताबिक फर्टिलिटी रेट 2.1 होना चाहिए। ताकि होने वाले 2 बच्चे मां-बाप की मृत्यु के पश्चात उनका स्थान ले लें। इससे धरती पर अतिरिक्त बोझ भी नहीं पड़ेगा। मुसलमानों का फर्टिलिटी रेट 3.1 है, जो दुनिया की आवश्यकता से 150 फीसदी ज्यादा है।”

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