प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री अपना मंत्रालय चलाने में अक्षम हैं या सच में सीधे हैं? – अकील

यह लेख असिस्टेंट प्रोफेसर अकील अहमद अंसारी के फेसबुक वाल से हूबहू ली गई है…

अम्बिकापुर, भारत सम्मान – एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि प्रश्न एवं आलोचना सदैव सत्तापक्ष की होनी चाहिए मेरा भी यही मानना है  परंतु आपदा के इस घड़ी में जनता के साथ कौन खड़ा है यह भी देखा जाना चाहिए, स्थानीय सत्ता-पक्ष के जनप्रतिनिधियों ने अपनी ही सरकार के अधीन कार्यरत जिला प्रशासन को स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर सामुहिक ज्ञापन सौंपा है।

अब बीजेपी और उनके समर्थकों को इस खबर से मजे लेने का मौका मिल गया है, कुछ लोग तो तंज कसने में राहुल और सोनिया गांधी तक पहुंच गए हैं, उन्हें अपनी पार्टी के मोदी और शाह की बगैर मास्क लगाए रोज की जाने वाली रैलियां दिखाई नहीं दे रही हैं, जिन रैलियों का हवाला देकर ही लोग ये कहते हुए लापरवाही बरत रहे थे कि कोरोना है तो पश्चिम बंगाल में क्यों नहीं जाता. ये लोग यूपी और मध्यप्रदेश के लिए आंख बंद कर लिए हैं. ये भूल गए हैं कि जिस नरेंद्र मोदी को भाजपा ने गुजरात मॉडल के तर्ज पर प्रोजेक्ट किया था उसी गुजरात में श्मशान की चिमनियां पिघल जा रही हैं।

संकट की इस घड़ी में राजनैतिक समालोचना करना मेरा उद्देश्य नहीं लेकिन बड़े शर्म की बात है कि जिस ज्ञापन को विपक्ष के नेताओं को जाकर सौंपना था, अव्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठानी थी, कांग्रेस को कटघरे में खड़े करना था वो सोशल मीडिया में मजे ले रही है. गत 15 साल के अपने कार्यकाल में ये लोग एक उदाहरण बता दें जब इन्होंने जनहित के लिए कभी अपनी पार्टी को असहज करते हुए कोई आवाज उठाई हो? इनके खुद के व्यक्तित्व में दम नहीं इसीलिए मिडिया-जीवी प्रधानमंत्री को हर जगह सामने करके अपना चेहरा छिपा लेते हैं।
इन्हें शायद मालूम नहीं कि महामारी से निपटने की प्रमुख जिम्मेदारी केंद्र सरकार की होती है. वह केंद्र सरकार जो अकेले पेट्रोल-डीजल में प्रति लीटर केवल टैक्स लगभग 33 रुपये ले रही है, इसके अतिरिक्त 18% से 28% जीएसटी, रेल से लेकर हर जन-सुविधाओं में शुल्क बढ़ाकर खरबों की राजस्व अर्जित कर रही है लेकिन फिर भी पिछले एक साल से स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर छत्तीसगढ़ को क्या दिया? चलिए कांग्रेस तो उनके लिए किसी विदेशी पार्टी की तरह है या यूं कहें शत्रु तुल्य है इसलिए ये लोग कम से कम ये ही बता दें कि भाजपा शासित राज्यों को क्या दिया?  निजीकरण की हितैषी सरकार ने चिकित्सा क्षेत्र में देश को कितना आत्मनिर्भर किया? इसके विपरीत ये योगी-शाह जिन अस्पतालों में कोरोना पॉजिटिव होने पर इलाज कराने जाते हैं वे पूर्व की सरकारों की ही देन है।

राजनीति का उदय हुआ था राज्य/देश चलाने के लिए, विकास एवं जन सरोकार के लिए निर्णय लेकर जनता के टैक्स के पैसे का जनता के हित में उपयोग करने एवं जनता के प्रति जवाबदेही तय करने के लिए. आरएसएस जनित भाजपा ने धर्म को ही अपनी राजनैतिक विचारधारा बना लिया. आप धर्म के आधार पर वोट दें, यदि काम अच्छा हुआ तो ‘सबका साथ सबका विकास’ और यदि बुरा हुआ तो धर्म आधारित सोच, हर असुविधा के लिए स्वयं व्यक्ति को ही या उसके पिछले जन्म को या इस जन्म के कुकर्मों को दोषी ठहराती है तो ऐसे में भला सरकार से प्रश्न करने का सवाल ही नहीं उठता, इसलिए 100 रुपये लीटर पेट्रोल खरीदकर भी लोग खामोश हैं, सरकारी कंपनियों को बेचा जा रहा है, देश में नौकरियां नहीं हैं फिर भी लोग शांत हैं।

इनकी खुद की पार्टी में भी सभी वरिष्ठ नेताओं के अस्तित्व को समाप्त कर केवल मोदी और शाह और भविष्य के लिए थोड़ा बहुत एक गंवार को महिमामण्डित करने का काम किया जा रहा है, इन तीनों को छोड़कर इस पार्टी में किसी अन्य नेता का कोई अस्तित्व है ही नहीं, पूरी तरह तानाशाही हावी है लेकिन पार्टी के भीतर कोई ‘चूँ-चपड़’ नहीं कर सकता. दरसल इन्हें अपने अंदर पल रहे नफ़रतों को फलने-फूलने देने का और धर्मांधता के नशे में मजे लेने को जो मिल रहा है इनके लिए वही पर्याप्त है. अब इनसे सीखकर एक और पार्टी अस्तित्व में आई है, जिसका नेता है ओवैसी, जो मौलवी के ड्रेस में बिल्कुल भाजपा के नेताओं की तरह केवल धार्मिक भाषण देता है, यदि किसी राज्य में उसकी भी सत्ता आ गयी तो कोई सवाल तो उससे कर नहीं सकेगा क्योंकि अन्य धर्मों की तरह इस्लाम में भी दुःख का कारण खुदा के बन्दे का  खुद गुनहगार होना है, जिसकी सजा अल्लाह ने उसे दिया है बाकी जो अच्छा होगा तो नेता उसका श्रेय लेने को तैयार रहेगा ही. कुल मिलाकर धर्म आधारित राजनीति से तो स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास की उम्मीद ही ना करें।

राजनीति में धर्म घुसने के कारण बड़े पैमाने पर वोट बैंक हासिल तो हुआ ही ऊपर से जनता के प्रति जवाबदेही भी नहीं है इसलिए अब कमोबेश हर राजनैतिक दल ऐसा करने लगे हैं. इससे इन राजनेताओं को एक और बड़ा फायदा यह हुआ कि फिक्स वोट बैंक मिल गए, अब आपको अपने आस-पास, आम जनता के बजाए कांग्रेसी-भाजपाई ज्यादा मिलेंगे जो दिन-रात किसी एक खूंटे को पकड़कर बैठे हैं और टीवी देखकर अपना विचार बनाते हैं, मेरा कहना है जो कांग्रेस-भाजपा के पदाधिकारी हैं उन्हें आप कांग्रेसी-भाजपाई रहने दीजिए उन्हें पद मिलता है, लाभ मिलता है आपको क्या मिलता है?  जनता में हमेशा से ये भावना होनी चाहिए कि जब जो अच्छा करे उसकी कम से कम केवल उस अच्छाई की तारीफ करें वहीं गलत होने पर विरोध करिए और सबसे बड़ी बात जो सत्ता में है उससे ज्यादा प्रश्न होना चाहिए और सबसे पहले उससे, जिसे हमने सीधे वोट दिया है.  हम सीधे प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को वोट नहीं देते बल्कि अपने स्थानीय पार्षद, विधायक, सांसद आदि को देते हैं।

वर्तमान राजनीति की स्थिति ऐसी हो गयी है कि हमें पता होता है कि चाहे लाख अनियमितताओं  का भंडाफोड़ हो जाए, पार्टी के नेता अपनी पार्टी का बेशर्मी से बचाव ही करेंगे और विपक्षी पार्टियों से भी हमें शायद ही ऐसा कुछ सुनने देखने को मिले कि जहां पर उनकी पार्टी की सरकार है वे शायद ही कोई प्रश्न उठाएं या उसकी आलोचना करें. यदि देश में यह परंपरा शुरू हो जाए कि पार्टी सिम्बल को ना देख हम जनप्रतिनिधि को देखकर वोट देना तय करें तो फिर हर राजनैतिक पार्टी को भी डर होगा कि उनके खुद के नेताओं के बीच विरोध शुरू हो जाएगा और पार्टियों की शीर्ष नेतृत्व, तानाशाह नहीं हो सकेंगी।

हालांकि सत्तापक्ष के जनप्रतिनिधियों के इस कदम की मैं व्यक्तिगत तौर पर सराहना करता हूँ परंतु केवल ज्ञापन सौंपकर आप जिम्मेदारी से नहीं बच सकते, आपको हमने वोट के माध्यम से चुना है, संकट की इस घड़ी में आपसे उम्मीद है कि भले ही आपकी पार्टी की सरकार है लेकिन अयोग्य और निकम्मे अधिकारियों एवं कर्मचारियों को हटाने के लिए आपको आंदोलन भी करना पड़े तो वह भी आप सभी से अपेक्षित है।

एक बड़ा प्रश्न ये भी है कि यदि प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री हमारे अपने शहर के ही हैं तो उन्हें भी ज्ञापन की एक प्रतिलिपि क्यों नहीं दी गई? वरिष्ठ कांग्रेसियों का कहना है “बाबा बहुत सीधे-साधे हैं उनकी सिधाई का नाजायज फायदा उठाया जा रहा है” खैर ये तो अब आम जनता को तय करना है कि हमारे स्वास्थ्य मंत्री अपना मंत्रालय चलाने में अक्षम हैं या सच में सीधे हैं? जिस वजह से प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति भयावह होती जा रही है।

अब भी कहता हूँ लॉक-डाउन कोई विकल्प नहीं है, जब भी यह हटेगा संक्रमण फिर से बढ़ेगा, इसलिए हर आदमी को अपनी और अपने परिवार के जान की हिफाज़त की जिम्मेदारी खुद लेनी होगी, प्रयास करें कि ऐसी स्थिति ही ना आए कि संक्रमण फैले. ज्यादा से ज्यादा वीडियो मैसेज, होर्डिंग, लाउडस्पीकर आदि से कोरोना के विषय में जन-जागरूकता फैलाने का प्रयास करना चाहिए एवं सरकारों को स्वास्थ्य की प्राथमिकता के आधार पर कार्य करना चाहिए।

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