क्या भूपेश बघेल से बेहतर मुख्यमंत्री साबित हो सकते थे टी०एस० सिंहदेव – अकील

पैलेस के भीतर की स्पष्ट व बेबाकी से समीक्षा आज तक पढ़ने व सुनने को नहीं मिला, यह लेख असिस्टेंट प्रोफेसर अकील अहमद अंसारी के फेसबुक वाल से ली गई है…

अंबिकापुर, भारत सम्मान – छत्तीसगढ़ सरकार के ढाई साल पूरे हो चुके हैं, मुख्यमंत्री बदलने की अफवाह और फेक न्यूज़ का सिलसिला जारी है, सरगुजा पैलेस के मुखिया और प्रदेश के वर्तमान स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव के बयानों पर गौर करें तो पता चलता है कि 2018 में मुख्यमंत्री का नाम तय करते समय संभवतः कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें ढाई साल बाद मुख्यमंत्री पद का कोई मौखिक आश्वासन दिया था। छत्तीसगढ़ शासन के कैबिनेट मंत्री रविन्द्र चौबे ने हाल ही में स्पष्ट किया है कि इस तरह की कोई बात नहीं है. 15 जून 2021 को मुख्यमंत्री के वर्चुअल लोकार्पण कार्यक्रम में शामिल रामानुजगंज विधायक एवं सरगुजा विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष बृहस्पति सिंह ने अम्बिकापुर सर्किट हाउस में एक प्रेस-कॉन्फ्रेंस में साफ तौर पर यह बता दिया कि सरगुजा एवं आसपास के क्षेत्रों में भी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को लेकर संतुष्टि एवं उत्साह है, उन्होंने तो अगले 25 वर्षों तक भी भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री बने रहने की बात तक कह दी।

जो अपने घर के बगल का एक अस्पताल नहीं संभाल सके वो प्रदेश क्या चला पाएंगे?
वोटरों में क्षेत्रीयता का भाव होता है, यह मांग उठती ही है कि मुखिया उनके यहां से हो अतः सरगुजा में भी तब ज्यादातर लोग यही चाहते थे परंतु जब कोरोना महामारी में पूरे देश और दुनियां की प्राथमिकता केवल लोगों का स्वास्थ्य ही रहा है तो जानकारों का मानना है कि ऐसे में प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री की भूमिका शायद मुख्यमंत्री से भी बढ़कर होनी चाहिए थी. इस आपदा में अपने नेतृत्व का जौहर दिखाने का जो सुनहरा अवसर श्री सिंहदेव के पास पिछले ढाई साल में था उसे उन्होंने ना केवल खो दिया है बल्कि एक स्वास्थ्य मंत्री के रूप में बुरी तरह से असफल भी हुए हैं।

प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की समीक्षा क्या करें, अव्यवस्था का आलम यह रहा कि पिछले ढाई वर्षों में प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री के घर के बगल में स्थित जिला अस्पताल अपनी घोर अव्यवस्था और कारगुजारियों के लिए सुर्खियों में रहा. स्थानीय अखबारों और सोशल मीडिया को ही खंगाल लें तो आए दिन कोई ना कोई अव्यवस्था से पीड़ित मरीज़ या उसका परिजन जिला अस्पताल की अनियमितताओं को लेकर अपनी पीड़ा सोशल मीडिया में डालता रहा है।

मान भी लें कि इस तरह के पोस्ट डालने वाले किसी विशेष राजनैतिक विचारधारा के अनुरूप, स्वास्थ्य मंत्री को बदनाम करने के ध्येय से ऐसा कर सकते हैं परंतु अम्बिकापुर के मेडिकल कॉलेज अस्पताल की बदहाली का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि 18 अप्रैल 2021 के अखबारों में यह पढ़ने को मिला कि उक्त अनियमितताओं से परेशान होकर स्वास्थ्य मंत्री के बेहद करीबी स्थानीय कांग्रेस के नेताओं को ही जिला कलेक्टर को पत्र लिखकर शिकायत करनी पड़ी कि ‘साहब कुछ कीजिए! अम्बिकापुर के सरकारी अस्पताल की हालत खस्ता है!’  पत्र लिखने वालों में कांग्रेस के जिला अध्यक्ष, महापौर तथा राज्य एवं कैबिनेट मंत्री के दर्जा प्राप्त नेतागण भी शामिल थे.  ऐसे में लोगों के लिए यह चर्चा का विषय क्यों ना हो कि जिन्हें हम मुख्यमंत्री के तौर पर देखना चाहते थे उनके निवास के बगल का एक अस्पताल तक उनसे संभल नहीं पाया तो भला प्रदेश ये कैसे संभालेंगे?

क्या खोते जा रहे हैं टीएस सिंहदेव अपने समर्थक?
अपने ब्लाइंड फॉलोवर के प्रति किसी नेता का व्यवहार खास तौर पर तब जब लंबे संघर्ष के बाद सत्ता आयी हो, बहुत मायने रखता है. सरगुजा पैलेस गुट के सुप्रीमो श्री टी.एस. सिंहदेव हैं जिन्हें  कुछ लोग सम्मान से आज भी सरगुजा महाराज कहकर पुकारते हैं, अब महाराज हैं, राजनीति है, तो जेहन में फ़िल्म ‘बाहुबली’ का जिक्र आ ही जाता है, जो सरगुजा पैलेस की राजनीति को जानता है वो सरगुजा पैलेस के ‘कट्टप्पा’ माने जाने वाले सेवानिवृत्त बैंककर्मी श्री त्रिभुवन सिंह उर्फ़’भुवन दा’ को  जरूर जानते होंगे, जो नहीं जानते उनके लिए मैं बता दूं कि कुछ वर्ष पूर्व तक की बात है भुवन दा की मौजूदगी में हम लोग प्रायोजित तौर पर भी यदि टी.एस. बाबा की आलोचना कर दिया करते थे तो इसके बाद आलम ये होता कि उनके (भुवन दा) क्रोध का भाजन हमें इस हद्द तक बनना पड़ता था कि वो हाथापाई तक उतर आते थे।

साथ में आधे घंटे के उनके टी.एस. बाबा के महिमामंडन का प्रवचन सुनने मिलता सो अलग, मुझे याद नहीं आता कि टी.एस सिंहदेव की निष्पक्ष आलोचना में भी कभी उन्होंने हामी तक भरी हो,  इस बात को लेकर मुझसे तो कई बार उनका अच्छा खासा बहस भी हुआ है…सरगुजा पैलेस के जिस ‘कट्टप्पा’ ने अपने जीवन के 45 साल पैलेस की अंधभक्ति में बिता दिए,  हर चौक-चौराहों पर लोगों से अपने ‘महाराज साहब’ के लिए व्यक्तिगत झगड़े किए… लोग बरबस ही पूछते हैं कि ऐसा क्या हो गया कि पैलेस के किचन कैबिनेट का आदमी सत्ता आते ही अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में उसी पैलेस की ईंट से ईंट बजाने पर आतुर है? इसका जवाब कम से कम मेरे पास तो नहीं ही है. हो सकता है कि राजकीय भाषा में यहां कट्टप्पा ही बागी हो परंतु यदि ये सही है तो वर्तमान में पैलेस के समर्थक से ज्यादा संख्या बागियों की क्यों है ? यह भी यक्ष प्रश्न है! 

राजनीति में वर्तमान के साथ-साथ भूत और भविष्य की अहमियत भी होती है, किसी निर्णय में नेता को दूरदर्शिता से काम लेना होता है, लोगों की नज़र होती है कि दल-बदल कर जाने वाले नेताओं के साथ कैसा व्यवहार हुआ, उनको संतुष्ट करके रखना भी किसी के नेतृत्व क्षमता की बड़ी परीक्षा होती है इसका ताजा उदाहरण आप कांग्रेस से भाजपा में आए ‘हिमंता बिस्वा सरमा’ को लेकर समझ सकते हैं जिन्हें भाजपा ने असम में मुख्यमंत्री बनाया है.

क्या दल-बदल कर आए अपने भूतपूर्व विरोधियों के लिए पूर्वाग्रह रखते हैं सिंहदेव?
बात है सन्  2008-09 की जब टी.एस. सिंहदेव अम्बिकापुर से पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ रहे थे उस समय  ‘हमर सरगुजा विकास मंच’ नामक एक मंच बनाकर  कुछ युवाओं ने टी.एस.सिंहदेव का जबरदस्त विरोध किया था जिसका एक सक्रिय सदस्य मैं खुद भी रह चुका हूँ, तब टी.एस.सिंहदेव मात्र 948 वोट के अंतर से ही जीत दर्ज करा पाए थे, जानकारों का मानना है कि ऐसा परिणाम आने के पीछे इस मंच के विरोध की बड़ी भूमिका थी. 2013-14 में जब देश में राष्ट्रवादी राजनीति और सेक्युलर फ्रंट के बीच ध्रुवीकरण हुआ तो टी.एस. सिंहदेव  कूटनीति और साम-दाम लगाकर  ‘विकास मंच’ को तोड़ने में सफल हुए और विकास मंच के अधिकांश सदस्य को प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से अपने समर्थन में लाने में सफलता भी हासिल कर ली परंतु उन्हें संतुष्ट करने में वे बुरी तरह फेल हुए. केवल ‘विकास मंच’ ही नहीं, भाजपा की छात्र इकाई, बसपा एवं सपा से भी कई लोग पैलेस गुट में शामिल हुए थे लेकिन पैलेस उन्हें भी अपने साथ जोड़कर रखने में बुरी तरह नाकाम  हुआ. बीते वर्षों में दशकों तक, पैलेस गुट में कांग्रेस का झंडा उठाने वाले कई महत्त्वपूर्ण कांग्रेसी या तो भाजपा में चले गए या पैलेस विरोधी गुट में जा मिले।

पैलेस गुट छोड़कर जाने वालों की मानें तो उनका कहना है कि “सरगुजा महाराज (टी.एस. सिंहदेव) को केवल अपराधी और अनपढ़ ऐसे लोग ही ज्यादा भाते हैं जो उन्हें ब्लैकमेल करके अपना धंधा-पानी चला सकें” कुछ का तो यह भी कहना है कि “पढ़े-लिखे या बुद्धिजीवी वर्ग का उनसे कोई मेल है ही नहीं! वे खुद से ज्यादा समझदार और विद्वान किसी को नहीं मानते”  एक असंतुष्ट कार्यकर्ता ने नाम गोपनीय रखने की शर्त पर बताया कि “बाबा (टी.एस. सिंहदेव) बाहर से विनम्र एवं व्यवहार कुशल जरूर नज़र आते हैं लेकिन उनके अंदर घोर पूर्वाग्रह एवं आत्ममुग्धता भरी हुई है।

बाबा कान के कच्चे हैं वर्षों वफादारी करने के बाद भी यदि किसी से एक गलती हो जाए तो पूरे किए धरे पर पानी फेर देंगे” राजनीति में किसी नेता की ख्याति और विश्वसनीयता की पहचान करने में दो बातें बहुत महत्त्वपूर्ण होती हैं पहला, खेमे में उसके पुराने सहयोगियों की स्थिति क्या है? और दूसरा कोई विरोधी खेमे का व्यक्ति यदि अपना दल या गुट छोड़कर आया है तो उसके प्रति नेतृत्व का व्यवहार कैसा है? इतिहास इन दोनों मापदंडों में टी०एस० सिंहदेव को एक नेता के रूप में सफल नहीं मानेगा.

क्या चाटूकारों एवं ड्रामेबाजों से भरा है सरगुजा पैलेस?
पैलेस के एक जानकार का कहना है कि “सरगुजा पैलेस की पूरी राजनीति का सार केवल चमचागिरी और चाटुकारिता ही रही है, जनहित के मुद्दे हों या न्याय इन सब बातों से पैलेस की राजनीति का दूर-दूर तक वास्ता नहीं है. कोई ऊर्जावान नेता यदि दूसरे दल से आकर  इन्हें  ज्वाइन कर भी ले तो उसे काम करता देख इस गुट में कोई पसंद नहीं करता, बस आप चर्चा करिए कि टी०एस० बाबा किसी मुहल्ले में जाते हैं तो खाना फलाँ के यहां खाते हैं ! बाबा का नाश्ता फलाँ के यहां से आता है! मुर्गे की टँगरी बाबा कैसे चबाते हैं, चावल को कांटे वाले चम्मच से बाबा खा जाते हैं वगैरह-वगैरह”

टी०एस० सिंह देव के पिता के जमाने में पैलेस गुट के बेहद करीब रहे एक वरिष्ठ सेवानिवृत्त शासकीय कर्मचारी बड़े दिलचस्प अंदाज में चमचागिरी का आंखों देखा हाल बयान करते हुए बताते हैं कि “किसी चौपाल कार्यक्रम या रोड शो में यदि टी.एस. बाबा आगे-आगे चल रहे हों तो इनके पीछे पुराने समर्थक भी चलते रहते हैं, पान मुंह में दबाए मंत्रमुग्ध होकर किसी दरबारी की तरह गर्व से पीछे-पीछे जाते ये लोग अचानक जब किसी प्रार्थी के गुहार पर राजा के द्वारा तलब कर लिए जाते हैं तो फर्जी सम्मान दिखाने के उद्देश्य से झुककर हड़बड़ी में पान उगलने लगते हैं, फिर बेतहाशा पानी खोजेंगे, पानी से फटाफट गार्गल करके जल्दी से मुंह साफ करके हाथ बांधे हुए ड्रामा करते हुए बाबा के आगे जाकर, जी बाबा! जी बाबा! कहकर सामने जा खड़े होते हैं, कुछ दूर चलने पर पुनः ये मुंह में पान दबा लेंगे और फिर वही प्रक्रिया दोहराएंगे…बाबा को ये सब खूब भाता है”

हालांकि उनका यह भी मानना है कि टी.एस. सिंहदेव के पिताजी में करिश्माई नेतृत्व क्षमता के साथ लोगों को जोड़कर रखने की कला थी, वे आगे बताते हैं कि तब के जमाने में अच्छे और जानकार लोगों की पैलेस में खासी अहमियत थी जबकि टी.एस. सिंहदेव अपने पिता के साथ राजनीति किए हुए लोगों को बड़ी बदतमीजी से सीधे नाम से संबोधित करते हैं, अपमानित महसूस करने के कारण टी०एस० सिंह देव का साथ लगभग सभी वरिष्ठ कांग्रसियों ने छोड़ दिया है।

कहने का लब्बोलुआब यह है कि टी०एस० सिंह देव को उनके विधानसभा क्षेत्र में ही एक बड़े तबके ने अस्वीकार करना शुरू कर दिया है. बीते दिनों उनकी लोकप्रियता में तेजी से कमी आई है,  शहर के राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है “सरगुजा पैलेस की दीवारें पुरानी हो चुकी हैं, कमजोर हो रहीं हैं और अम्बिकापुर में निर्माणाधीन कांग्रेस कार्यालय के बनने के बाद और भी कमजोर होंगी” अब सच क्या है ये तो समय ही तय करेगा लेकिन बावजूद इन सब के अब भी उनके कुछ कट्टर समर्थक मौजूद हैं जो टी०एस० बाबा को अपना आदर्श नेता मानते हैं और कहते हैं “बाबा सीधे-साधे हैं उनके महकमें में जो थोड़ी-बहुत अव्यवस्था देखने को मिल रही है वो निकम्मे अधिकारी उनकी सिधाई का फायदा उठा रहे हैं इस कारण है” हालांकि ऑफ द रिकॉर्ड वे इस बात की शिकायत भी करते हैं कि बाबा ने अपने मातहत काम करने वाले तनख्वाह प्राप्त कर्मचारियों को अपने राजनैतिक सहयोगियों के ऊपर थोप रखा है जो उन्हें अपमानजनक लगता है।

सिंहदेव के पिता एम.एस. सिंहदेव अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव भी रह चुके हैं अतः राजघराने के साथ-साथ उच्च अधिकारी को प्राप्त सुविधाओं के साथ पले-बढ़े टी.एस. सिंहदेव संभवतः एक आम आदमी से ज्यादा किसी ब्यूरोक्रेट्स के जीवन को ज्यादा करीब से समझते हों, शायद इसीलिए अधिकारियों के प्रति उनका विनम्र व्यवहार ब्यूरोक्रेट्स जगत को बहुत भाता है और मुख्यमंत्री के तौर पर अधिकारियों की तो वे पहली पसंद रहे हैं।

अब अभिजात्य वर्ग के संपन्न लोग भला यह कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं  कि एक किसान का पुत्र जो कल तक किसी चौक पर जिंदाबाद-मुर्दाबाद करते, धरना प्रदर्शन करते दिखाई देता था आज मुख्यमंत्री बना बैठा है, जो टाटा प्रोजेक्ट की जमीन गरीबों को वापस कर देता हो और तो और एक मामूली लड़के को महज़ थप्पड़ मारने भर से एक कलेक्टर की छुट्टी कर देता हो वह भला अच्छा मुख्यमंत्री कैसे हो सकता है? बिल्कुल नहीं हो सकता।

अतः व्यक्तिगत तौर पर मैं राहुल गांधी से मांग करता हूँ कि वे प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह एवं भाजपा से सरगुजा सांसद श्रीमती रेणुका सिंह की मांग को तत्काल पूरा करें और 700 करोड़ के मालिक, सरगुजा राजघराने की शान और तथाकथित महाराजा त्रिभुनेश्वर शरण सिंहदेव को छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बनाएं।

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