गांधी जयंती पर हथियारों की तस्वीरों को लेकर शिकायत, पुलिस से सख्त जांच की मांग
सोशल मीडिया पर अधिवक्ता संजय अंबष्ट और नाबालिग के हाथों में कथित हथियारों की तस्वीरों का मामला गरमाया; शिकायतकर्ता ने लाइसेंस, हथियारों की प्रकृति और तस्वीरों की सत्यता की जांच की मांग की

अंबिकापुर, 2 अक्टूबर। विशेष रिपोर्ट
एक तरफ 2 अक्टूबर को पूरा देश महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा और शांति के संदेश को याद कर रहा है, वहीं अंबिकापुर में सोशल मीडिया पर कथित तौर पर हथियारों के प्रदर्शन को लेकर पुलिस के सामने गंभीर शिकायत पहुंची है। समाजसेवी अभय नारायण पांडेय ने सरगुजा रेंज के पुलिस महानिरीक्षक को शिकायत सौंपकर अधिवक्ता संजय अंबष्ट तथा उनके नाबालिग पुत्र से संबंधित फेसबुक पोस्ट और तस्वीरों की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।


शिकायत में आरोप लगाया गया है कि फेसबुक पर अलग-अलग वर्षों में ऐसी तस्वीरें पोस्ट की गईं, जिनमें संजय अंबष्ट कथित रूप से विभिन्न आग्नेयास्त्रों के साथ नजर आते हैं। शिकायतकर्ता ने सवाल उठाया है कि यदि तस्वीरों में दिखाई दे रहे हथियार वास्तविक आग्नेयास्त्र हैं तो उनका स्रोत क्या था, वे किसके नाम पर पंजीकृत थे, उनके लिए वैध लाइसेंस था या नहीं और नाबालिग के हाथ में हथियार कैसे पहुंचा?
हालांकि, इन आरोपों और तस्वीरों की स्वतंत्र पुष्टि पुलिस जांच का विषय है। किसी व्यक्ति को केवल सोशल मीडिया तस्वीरों के आधार पर अपराधी मानना उचित नहीं होगा।
2015 से 2018 तक की तस्वीरों पर उठे सवाल
शिकायतकर्ता के मुताबिक फेसबुक अकाउंट पर अलग-अलग तारीखों की कई तस्वीरें मौजूद हैं, जिनमें कथित हथियार दिखाई देते हैं।

AK-47 पैटर्न राइफल जैसा हथियार—5 जनवरी 2015
शिकायत में 5 जनवरी 2015 की एक तस्वीर का उल्लेख किया गया है, जिसमें संजय अंबष्ट के हाथ में AK-47 पैटर्न/असॉल्ट राइफल जैसी दिखाई देने वाली बंदूक बताई गई है। शिकायतकर्ता ने यह पता लगाने की मांग की है कि तस्वीर में दिखाई देने वाला हथियार वास्तविक firearm था अथवा किसी प्रकार की replica/air gun/प्रशिक्षण संबंधी वस्तु।
यदि यह वास्तविक हथियार था तो उसके स्वामित्व, लाइसेंस, सीरियल नंबर और स्रोत की जांच किए जाने की मांग की गई है।

पिस्तौल जैसी वस्तु की तस्वीर—21 फरवरी 2015
एक अन्य तस्वीर को लेकर शिकायतकर्ता ने पिस्तौलनुमा हथियार के लाइसेंस और स्वामित्व की जांच की मांग की है। सवाल सीधा है—हथियार वास्तविक था तो किसके नाम पर था और उसे रखने अथवा प्रदर्शित करने का वैधानिक अधिकार किसके पास था?
स्कोप वाली राइफल—25 जून 2017
25 जून 2017 की बताई गई तस्वीर में स्कोप लगी लंबी राइफल दिखाई देने का दावा शिकायत में किया गया है। शिकायतकर्ता ने इसकी भी विशेषज्ञ जांच तथा लाइसेंस संबंधी दस्तावेजों के सत्यापन की मांग की है।

नाबालिग के हाथ में कथित शॉटगन—7 अक्टूबर 2015
सबसे गंभीर सवाल उस तस्वीर को लेकर उठाया गया है जिसमें शिकायतकर्ता के अनुसार संजय अंबष्ट के नाबालिग पुत्र के हाथ में लंबी बैरल वाली बंदूक/शॉटगन जैसी वस्तु दिखाई देती है।
शिकायत में कथित रूप से “अपनी-अपनी खैर मनाओ…” जैसे कैप्शन का भी उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि तस्वीर में वास्तविक firearm है तो पुलिस को यह जांचना चाहिए कि नाबालिग को उसके संपर्क में आने की अनुमति किसने दी और हथियार किसके कब्जे में था।

तलवार के साथ नाबालिग की तस्वीर—28 जुलाई 2018
शिकायत में 28 जुलाई 2018 की एक तस्वीर का भी उल्लेख है, जिसमें नाबालिग के हाथ में तलवार जैसी धारदार वस्तु होने का दावा किया गया है। शिकायतकर्ता ने इसके संबंध में भी परिस्थितियों और तस्वीर की प्रामाणिकता की जांच की मांग की है।
कानून का सवाल: 21 वर्ष से कम उम्र और firearm
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी तथ्य भी सामने आता है। Arms Act, 1959 की धारा 9 के अनुसार 21 वर्ष की आयु पूरी नहीं करने वाला व्यक्ति सामान्यतः firearm या ammunition को acquire, possess या carry नहीं कर सकता, हालांकि अधिनियम में प्रशिक्षण आदि से संबंधित निर्धारित अपवाद मौजूद हैं।
वहीं धारा 3 सामान्यतः firearm अथवा ammunition रखने/ले जाने के लिए लाइसेंस की आवश्यकता निर्धारित करती है। धारा 7 prohibited arms और ammunition के संबंध में अतिरिक्त प्रतिबंध लगाती है। उल्लंघन की परिस्थितियों के अनुसार धारा 25 में दंड का प्रावधान है।
इसलिए शिकायत का असली परीक्षण सोशल मीडिया तस्वीरों से नहीं, बल्कि पुलिस की जांच से होगा—हथियार असली था या नहीं, किस श्रेणी का था, किसके नाम पर था, लाइसेंस था या नहीं और नाबालिग के हाथ तक कैसे पहुंचा।
JJ Act की धारा 23 का भी उल्लेख
शिकायत में तत्कालीन लागू Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2000 की धारा 23 का भी उल्लेख किया गया है। इस धारा में बच्चे को ऐसी परिस्थितियों में assault, abandonment, exposure या wilful neglect से बचाने का प्रावधान था, जिससे उसे अनावश्यक मानसिक या शारीरिक suffering हो।
हालांकि, इस प्रावधान का किसी विशेष मामले में लागू होना तथ्यों और जांच पर निर्भर करेगा।
डिजिटल साक्ष्य भी जांच के घेरे में
शिकायतकर्ता ने दावा किया है कि संबंधित फेसबुक पोस्ट और तस्वीरों से जुड़े डिजिटल साक्ष्य तथा मेटाडेटा सुरक्षित किए गए हैं। उनका कहना है कि जरूरत पड़ने पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से आधिकारिक रिकॉर्ड प्राप्त कराकर पोस्ट की तारीख, समय, अपलोडिंग और प्रामाणिकता का परीक्षण कराया जा सकता है।
यही बिंदु इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण है। क्योंकि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली तस्वीर को वास्तविक हथियार, वास्तविक घटना और वास्तविक तारीख का प्रमाण मानने से पहले डिजिटल फॉरेंसिक सत्यापन जरूरी है। अब सवाल पुलिस से—तस्वीर देखकर नहीं, जांच करके बताइए
मामले ने पुलिस के सामने कई सीधे सवाल खड़े कर दिए हैं—
क्या तस्वीरों में दिखाई देने वाले हथियार वास्तविक हैं?
यदि वास्तविक हैं तो उनका लाइसेंस किसके नाम पर है?
हथियार का सीरियल नंबर और वैध रिकॉर्ड क्या है?
यदि कोई हथियार प्रतिबंधित श्रेणी का है तो वह वहां तक कैसे पहुंचा?
नाबालिग के हाथ में कथित firearm कैसे पहुंचा?
क्या तस्वीरों और उनके कैप्शन की डिजिटल फॉरेंसिक जांच होगी?
क्या संबंधित हथियारों को जब्त कर विशेषज्ञ से परीक्षण कराया जाएगा?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि कानून की नजर में हथियार का प्रदर्शन और हथियार का अवैध कब्जा अलग-अलग कानूनी प्रश्न हो सकते हैं—तो पुलिस प्रत्येक तस्वीर और प्रत्येक हथियार की स्वतंत्र रूप से जांच करेगी या मामला केवल सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित रह जाएगा?
गांधी जयंती के दिन सामने आई यह शिकायत इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि एक ओर देश अहिंसा और शांति का संदेश दोहरा रहा है, वहीं दूसरी ओर शिकायतकर्ता ने पुलिस से कथित हथियार प्रदर्शन के मामले में कानून के मुताबिक निष्पक्ष और दस्तावेजी जांच की मांग की है।
अब निगाहें सरगुजा के पुलिस की कार्रवाई पर हैं। शिकायत में लगाए गए आरोप सही हैं या तस्वीरों में दिखाई देने वाली वस्तुएं वैध/गैर-घातक/प्रतिकृति हैं—इसका अंतिम उत्तर पुलिस की तकनीकी जांच और उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड ही दे सकते हैं।
कानून का सवाल तस्वीरों से नहीं, जांच के निष्कर्ष से तय होगा।



