15 साल पुराने पुलिस हिरासत मौत मामले में ऐतिहासिक फैसला: थाना प्रभारी समेत 9 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद

वाशिम (महाराष्ट्र)। विशेष रिपोर्ट
महाराष्ट्र के वाशिम जिले में वर्ष 2011 में हुई पुलिस हिरासत में मौत के चर्चित मामले में जिला एवं सत्र न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए तत्कालीन थाना प्रभारी सहित नौ पुलिसकर्मियों को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा सुनाई है। अदालत के इस फैसले को पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों के मामलों में जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।
चोरी के शक में हिरासत, फिर हुई मौत
यह मामला वर्ष 2011 का है, जब बेग्या पवार नामक व्यक्ति को चोरी के संदेह में पूछताछ के लिए रिसोड पुलिस स्टेशन लाया गया था। आरोप था कि पूछताछ के दौरान पुलिसकर्मियों ने उसके साथ बर्बर मारपीट की, जिससे उसकी हालत गंभीर हो गई और बाद में उसकी मौत हो गई।
मामले के बाद परिजनों और सामाजिक संगठनों ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए थे। घटना ने उस समय पूरे क्षेत्र में आक्रोश पैदा कर दिया था और निष्पक्ष जांच की मांग उठी थी।
15 वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई
मामले की जांच और न्यायिक प्रक्रिया करीब 15 वर्षों तक चली। अभियोजन पक्ष ने अदालत के समक्ष गवाहों, चिकित्सीय रिपोर्ट तथा अन्य साक्ष्यों के आधार पर यह साबित करने का प्रयास किया कि हिरासत के दौरान हुई मारपीट के कारण ही बेग्या पवार की मौत हुई।
लंबी सुनवाई के बाद जिला एवं सत्र न्यायाधीश जयसिंग झपाटे ने सभी साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए आरोपियों को दोषी माना और उनके खिलाफ कड़ा फैसला सुनाया।
थाना प्रभारी समेत 9 पुलिसकर्मी दोषी
अदालत ने इस मामले में तत्कालीन रिसोड थाना प्रभारी महादेव माणिक धांडे सहित कुल 9 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। दोषियों में दो पुलिसकर्मी ऐसे भी हैं जो सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
फैसले के बाद सभी दोषियों को न्यायालय से सीधे हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया। प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें अमरावती सेंट्रल जेल स्थानांतरित किया जाएगा।
पुलिस हिरासत में मौत के मामलों पर कड़ा संदेश
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। यदि पुलिस हिरासत में किसी व्यक्ति के साथ अत्याचार होता है और उसकी मौत होती है, तो जिम्मेदार अधिकारियों को भी कठोर सजा का सामना करना पड़ सकता है।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भी इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि इससे पुलिस हिरासत में होने वाले अत्याचारों पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी तथा पीड़ित परिवारों का न्याय व्यवस्था पर विश्वास और मजबूत होगा।
न्याय की मिसाल
करीब डेढ़ दशक तक चली इस कानूनी लड़ाई के बाद आया यह फैसला न केवल बेग्या पवार के परिवार के लिए न्याय का प्रतीक माना जा रहा है, बल्कि देशभर में पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों के मामलों में जवाबदेही तय करने वाली एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल के रूप में भी देखा जा रहा है। अब इस मामले पर सभी की नजरें संभावित अपील और आगे की कानूनी प्रक्रिया पर रहेंगी।



