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पूर्व विधायक के हस्तक्षेप के बाद धान खरीदी केंद्र में शुरू हुई खरीदी

समय से पहले खरीदी बंद करना साय सरकार के लिए बन सकता है गले की फाँस

छत्तीसगढ़/बालोद/गुरुर | विनोद नेताम

बालोद जिले के गुरुर विकासखंड स्थित खुंदनी धान खरीदी केंद्र में लंबे समय से ठप पड़ी धान खरीदी आखिरकार कांग्रेस के पूर्व विधायक भैय्या राम सिन्हा के हस्तक्षेप के बाद शुरू हो सकी। इससे पहले यहां के किसान इस बात से मायूस थे कि टोकन कटने के बावजूद उनका धान खरीदी केंद्र में नहीं लिया जा रहा था।

ग्राम परसुली के किसान बिरसिंग साहू सहित कई किसानों का आज की तारीख में विधिवत टोकन काटा गया था, लेकिन इसके बावजूद धान खरीदी केंद्र प्रबंधन ने धान लेने से इनकार कर दिया था। इस खबर के बाद क्षेत्र के किसानों में भारी आक्रोश और निराशा देखी गई।

किसानों की गंभीर समस्या की जानकारी मिलते ही पूर्व विधायक भैय्या राम सिन्हा मौके पर पहुंचे। उनके साथ ब्लॉक कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष डॉ. किशोर साहू, कांग्रेस महामंत्री शादिक अली, शैलेष ‘मोनू’ ठाकुर (ब्लॉक युवा कांग्रेस अध्यक्ष, गुरुर), हिमांशु लावत्रे सहित बड़ी संख्या में कांग्रेसी कार्यकर्ता और आसपास के किसान मौजूद रहे। पूर्व विधायक के दखल के बाद ही खुंदनी धान खरीदी केंद्र में धान खरीदी का कार्य प्रारंभ हो सका।

इस बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि जब राज्य में लगभग 7 करोड़ रुपये के धान को भंडारण और अव्यवस्था के कारण “चूहों के हवाले” होने की चर्चाएं सामने आ चुकी हैं, तो फिर असली अन्नदाता किसानों का धान क्यों नहीं खरीदा जा रहा। आरोप है कि बीते कुछ समय से अघोषित रूप से चल रही धान खरीदी को अधिकारियों के जरिए अचानक बंद करवा दिया गया, जिससे बड़ी संख्या में किसान अपना एक दाना धान भी बेचने में असफल रहे।

छह महीने की कड़ी मेहनत, पसीने और लागत के बाद भी धान नहीं बेच पाने वाले किसानों के सपने इस फैसले से चकनाचूर होते नजर आ रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या बिना धान बिके किसान खुशहाल रह पाएंगे? और जब राज्य का किसान वर्ग चिंतित और आक्रोशित रहेगा, तब क्या प्रदेश की सरकार यूँ ही “सब ठीक है” का दावा करती रह सकती है?

छत्तीसगढ़ की पहचान धान और किसान से जुड़ी है। लेकिन यदि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार इस वर्ष बड़ी संख्या में किसानों का धान खरीदने में विफल रहती है और किसान असंतोष गहराता है, तो इसका राजनीतिक और सामाजिक असर भविष्य में सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी को भारी पड़ सकता है।

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