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सत्ता की हनक या सरेआम गुंडाराज? मुख्यमंत्री के गृह जिले में पुलिस के सामने पत्रकार की बेरहमी से पिटाई; थाने में भू-माफियाओं का नंगा नाच!

'सुशासन' के मुंह पर कालिख! पत्थलगांव के 'सेठों' के सामने नतमस्तक पुलिस; क्या SDOP ने ही सुपारी देकर पत्रकार को थाने बुलाकर पिटवाया?

पत्थलगांव (जशपुर) | विशेष रिपोर्ट:

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ आज लहूलुहान है और कानून-व्यवस्था तमाशबीन! छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के गृह जिले जशपुर से एक ऐसी रूह कंपा देने वाली वारदात सामने आई है, जिसने सूबे के “सुशासन” के दावों को तार-तार कर दिया है। पत्थलगांव थाना क्षेत्र में जो कुछ भी हुआ, वह सिर्फ एक पत्रकार पर हमला नहीं, बल्कि समूची न्यायप्रणाली और आम जनता की आवाज का सरेआम कत्ल है!

एक बेबस परिवार की बेशकीमती जमीन को फर्जीवाड़े से हड़पने और विरोध करने पर भू-स्वामी की हत्या करने वाले कथित भू-माफियाओं का पर्दाफाश करना ही पत्रकार अमित पांडेय का सबसे बड़ा गुनाह बन गया।

वर्दी ने दिखाई पीठ:

थाने के भीतर, पुलिस बल और खुद SDOP की मौजूदगी में सत्ता से जुड़े गुंडे पत्रकार के गिरेबान पर हाथ डालते हैं, उसे बेरहमी से पीटते हैं और कानून के रखवाले मूकदर्शक बनकर तमाशा देखते रहे।

पैसे की हनक के आगे घुटने टेकती पुलिस:

जिस पुलिस को जनता की रक्षा करनी थी, उसकी रीढ़ आज पैसे की ताकत के आगे पूरी तरह झुक चुकी है।

पीड़ित का दर्द, व्यवस्था को तमाचा:

“डेढ़ दशक (15 साल) से हम घुट-घुट कर जी रहे थे, हमारे पास आवाज उठाने की हिम्मत नहीं थी। अमित पांडेय की खबरों को देखकर हमारे भीतर न्याय की उम्मीद जगी थी। लेकिन आज सच दिखाने वाले को ही थाने के भीतर लहूलुहान कर दिया गया।”

नख से शिख तक अवैध धंधों में डूबे लोग, अब पत्रकार से मांग रहे ‘लाइसेंस’!

जो खुद सिर से पैर तक काले कारनामों, कोयला चोरी, अवैध रेत खनन, नकली बीज बेचने और फर्जी दस्तावेजों के जरिए सौ करोड़ की सरकारी व निजी जमीनें हड़पने के धंधे में डूबे हुए हैं, वे आज पत्रकार से उसकी डिग्री और ‘लाइसेंस’ मांग रहे हैं!

चरित्र हनन की घटिया साजिश: जब रसूखदार पत्रकार के हौसलों को नहीं डिगा पाते, तो वे चरित्र हनन पर उतर आते हैं। उन पर वसूली (Extortion) के झूठे केस थोपने की धमकी दी जाती है।

पूरी नैतिकता सिर्फ पत्रकार के हिस्से? दुनिया भर के फर्जीवाड़े खुद करेंगे, लेकिन भाषा की मर्यादा, त्रुटिरहित लेखनी और आदर्श आचरण की सारी उम्मीदें सिर्फ और सिर्फ पत्रकार से चाहिए!

प्रेस क्लब की चुप्पी:

इस संकट की घड़ी में भी सत्ता की चाटुकारिता करने वाले कुछ स्वयंभू पत्रकार और प्रेस क्लब के दलाल रसूखदारों के तलवे चाटने में व्यस्त हैं और पीड़ित पत्रकार के खिलाफ खड़े हैं।
दिक्कत पत्रकारिता से नहीं, ‘बिकने’ से इनकार करने वाले ईमानदार से है!
इन तथाकथित नेताओं और भू-माफियाओं को उन चाटुकार पत्रकारों से कोई दिक्कत नहीं है जो सुबह-शाम इनकी आरती उतारते हैं। इन्हें दिक्कत उस बेखौफ पत्रकार से है जो:

1. त्योहारों पर मिलने वाले रिश्वत के ‘लिफाफे’ को ठोकर मार देता है।

2. बड़ी से बड़ी खबरों को दबाने के लिए फेंकी जाने वाली मोटी रकम के आगे झुकने से इनकार कर देता है।

3. नेताओं की फूहड़ बयानबाजी दिखाने के बजाय, जनता के असल मुद्दों जैसे— नकली बीज से बर्बाद होते किसान, चोरी के शक में गरीब को करंट लगाने की प्रताड़ना और पुलिसिया बदसलूकी को कैमरे पर बेनकाब करता है।

आखिरी जंग: जब तक जनसमर्थन है, न भू-माफिया बचेंगे न भ्रष्ट तंत्र!

कानून के रखवाले भले ही बिक चुके हों, सत्ता के दलाल भले ही अपनी हनक दिखा लें, लेकिन सच को दबाया नहीं जा सकता। अमित पांडेय जैसे ईमानदार पत्रकारों की असली ताकत यह बिकाऊ तंत्र नहीं, बल्कि वह गरीब जनता है जिसकी वे आवाज बनते हैं। शोषितों की दुआओं और बुजुर्गों के आशीर्वाद के आगे यह भ्रष्ट साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।

जशपुर जिले का व्यापारिक केंद्र पत्थलगांव आज चर्चा में है। पर यह चर्चा व्यापार की नहीं, बल्कि सत्ता की हनक, ‘सेठ जी’ लोगों के अकूत साम्राज्य और पुलिसिया दलाली के उस भयावह गठजोड़ की है जिसने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को सरेआम लहूलुहान कर दिया।

क्या यह सिर्फ एक प्रशासनिक विफलता है? या फिर एक सुनियोजित साजिश, जिसमें खुद पुलिस ने अपराधियों को बुलाकर पत्रकार की पीठ पर लात-घूंसे बरसने दिए? इस सनसनीखेज कांड के कई ऐसे चेहरे और पहलू सामने आ रहे हैं, जिन्होंने पूरे छत्तीसगढ़ की सियासत और पुलिसिंग पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बड़ा सवाल:

SDOP के सामने पिटाई हुई… या खुद SDOP ध्रुवेश जायसवाल ने ही साजिश रचकर थाने बुलवाया?

एसडीओपी (SDOP) का एक ही संभाग में सबसे लंबे समय तक जमे रहने का रिकॉर्ड: लगातार तैनाती: वर्ष 2020 के आसपास सरगुजा संभाग में पदस्थापना हुई थी। रिकॉर्ड कार्यकाल: तब से लेकर आज (वर्ष 2026) तक, पिछले लगभग 6 सालों से एक ही संभाग में लगातार डटे हुए हैं।

SDOP पर महिला द्वारा बदतमीजी का आरोप और बाद में केस वापसी:

 लगाया गया आरोप: एक महिला द्वारा (SDOP पर) दुर्व्यवहार और बदतमीजी करने का गंभीर आरोप लगाया गया बकायेदे वीडियो बनाकर सारी घटनाक्रम को उजागर किया था।

मामले में मोड़:

शिकायत दर्ज होने के बाद मामले ने तूल पकड़ा, लेकिन बाद में परिस्थितियों के चलते महिला ने अपना केस वापस ले लिया। वर्तमान स्थिति: महिला द्वारा शिकायत वापस लिए जाने के बाद इस मामले में कानूनी/प्रशासनिक कार्रवाई पर फिलहाल विराम लग गया है।

 चर्चा का विषय: प्रशासनिक हलकों में एक ही क्षेत्र में इतने लंबे समय तक बने रहना प्रशासनिक फेरबदल और नियमों के लिहाज से एक अनोखा रिकॉर्ड माना जा रहा है।

इस पूरे मामले का सबसे घिनौना और संदिग्ध किरदार हैं एसडीओपी ध्रुवेश जायसवाल। यह सवाल अब फिजाओं में गूंज रहा है: क्या एक जिम्मेदार पुलिस अधिकारी के सामने किसी गुंडे की इतनी जुर्रत हो सकती है कि वह पत्रकार का गिरेबान पकड़े?

या फिर सच यह है कि भू-माफियाओं और ‘सेठों’ के भारी-भरकम ‘इंतजाम’ के बाद खुद एसडीओपी ने ही पत्रकार अमित पांडेय को थाने बुलवाया ताकि वहां पहले से तैयार बैठे गुंडे पुलिस की मौजूदगी के ‘सुरक्षित घेरे’ में अपनी भड़ास निकाल सकें?

पुराना और दागदार इतिहास: ध्रुवेश जायसवाल के लिए पत्रकारों को प्रताड़ित करना कोई नया काम नहीं है।

बलरामपुर (वाड्रफनगर) कार्यकाल:

जब यह अधिकारी बलरामपुर में पदस्थ थे, तब कोयला-रेत माफिया और पुलिसिया सांठगांठ को उजागर करने वाले निर्भीक पत्रकारों पर जबरन फिरौती व रंगदारी के फर्जी मुकदमे दर्ज कर उन्हें जेल भेजा गया था。 यह मामला इतना गंभीर था कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को इनके खिलाफ आधिकारिक तौर पर जांच के निर्देश देने पड़े थे।

सरगुजा (अम्बिकापुर) कार्यकाल:

आदिवासियों (विशेषकर पहाड़ी कोरवाओं) के लाखों रुपये के हक को डकारने वाले भ्रष्ट एनजीओ और अधिकारियों को मूक संरक्षण देने में भी इस अधिकारी की कार्यप्रणाली पर गंभीर उंगलियां उठी थी।

जशपुर (पत्थलगांव) कार्यकाल:

अब जशपुर आते ही, अपनी पुरानी आदतों के मुताबिक, इन्होंने फिर से भू-माफियाओं के तलवे चाटने और सच की आवाज उठाने वाले पत्रकार की हस्ती मिटाने का ठेका ले लिया है।

‘सेठ जी’ लोगों का गढ़ है पत्थलगांव: जहां रसूख के आगे कानून बौना है!

पत्थलगांव पारंपरिक रूप से बड़े-बड़े रसूखदार व्यापारियों और ‘सेठ जी’ लोगों का गढ़ माना जाता है। यहाँ जमीन के खेल, अवैध कब्जे, टैक्स चोरी और रसूख के बल पर गरीबों की जमीनों पर अट्टालिकाएं खड़ी करना एक आम बात है।

जब इन रसूखदारों के काले साम्राज्यों पर आंच आती है, तो ये कानून को अपनी जेब में रखने की कोशिश करते हैं।
आरोप है कि इन ‘सेठों’ के अरबों रुपये के लैंड स्कैम (जमीन फर्जीवाड़ा) और हत्या के मामलों को जब पत्रकार अमित पांडेय ने बेनकाब किया, तो इन रसूखदारों ने पुलिस विभाग को अपनी ‘प्राइवेट सिक्योरिटी’ की तरह इस्तेमाल किया।

विपक्ष की रीढ़विहीन राजनीति: कांग्रेस सिर्फ ‘ट्विटर’ पर शेर, जमीनी हकीकत में मौन!

इस पूरे मामले में जितना कसूर सत्ताधारी गुंडों और पुलिस का है, उतना ही कसूर छत्तीसगढ़ के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस का भी है।

सोशल मीडिया की ‘टॉइलट’ एक्टिविज्म:

कांग्रेस के बड़े नेता केवल अपने बंद कमरों में बैठकर सोशल मीडिया (X और फेसबुक) पर निंदा-प्रस्ताव के दो-चार पोस्ट शेयर करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ले रहे हैं। जमीन पर उतरकर पीड़ित पत्रकार के पक्ष में और इस तानाशाही के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने का दम विपक्षी दल में नहीं दिख रहा है।

दलाली और सेटिंग का खेल?

पत्थलगांव के ‘सेठों’ का रसूख केवल भाजपा तक सीमित नहीं है, उनके तार कांग्रेस के बड़े नेताओं की जेबों से भी जुड़े हुए हैं। यही वजह है कि कांग्रेस इस मुद्दे पर केवल औपचारिकता निभा रही है, कोई आक्रामक विरोध प्रदर्शन नहीं कर रही।

सरगुजा के ‘महाराज’ टी.एस. सिंहदेव मौन क्यों?

छत्तीसगढ़ की राजनीति का एक और सबसे बड़ा विरोधाभास इस घटना से उजागर हुआ है।

पीसीसी चीफ की दौड़ और संभाग में सन्नाटा: कांग्रेस नेता टी.एस. सिंहदेव (टीएस बाबा) इस वक्त प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (PCC Chief) बनने की दौड़ में सबसे आगे चल रहे हैं।

अपने ही क्षेत्र में इतनी बड़ी वारदात पर चुप्पी: सरगुजा संभाग सिंहदेव का गृह क्षेत्र है। इसी संभाग के अंतर्गत आने वाले मुख्यमंत्री के गृह जिले जशपुर में इतनी बड़ी अमानवीय घटना घट जाती है, एक निर्भीक पत्रकार को पुलिस थाने के अंदर घसीटकर पीटा जाता है, लेकिन ‘महाराज’ के मुंह से एक शब्द तक नहीं फूटता!

जनता पूछ रही सवाल:

क्या प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी की लॉबिंग में व्यस्त सिंहदेव को अपने क्षेत्र के शोषितों और सच लिखने वाले पत्रकारों की चीख सुनाई नहीं दे रही? या फिर ‘सेठों’ के रसूख के आगे सरगुजा के ‘महाराज’ ने भी चुप्पी साध लेना ही बेहतर समझा?

पत्थलगांव की यह काली रात गवाह है कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, सत्ता के दलाल पुलिस थानों का संचालन करने लगें, और विपक्ष केवल सोशल मीडिया में अपनी खीझ मिटाए… तब जंग सीधे ‘जनता बनाम व्यवस्था’ की हो जाती है।

क्या इस भ्रष्ट तंत्र, बिके हुए SDOP ध्रुवेश जायसवाल और रीढ़विहीन विपक्ष के खिलाफ जशपुर और पूरे छत्तीसगढ़ की जनता सड़कों पर उतरेगी? या फिर सुशासन के नाम पर चल रहे इस नंगे नाच को मूकदर्शक बनकर सहती रहेगी? आपकी चुप्पी ही अपराधियों की सबसे बड़ी ताकत है। तय आपको करना है!

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