प्रतापपुर में खाद माफिया का साम्राज्य,किसानों का सब्र अब आंदोलन की कगार पर

सोसायटियों में खाद गायब, बाजार में कालाबाजारी – प्रशासन की खामोशी पर उठे सवाल।
भारत सम्मान/सूरजपुर/युसूफ मोमिन-खेती का मौसम है, लेकिन अन्नदाता हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। खेतों में बुआई के लिए खाद चाहिए, मगर सोसायटियों के गोदाम खाली पड़े हैं। बाजार में माफिया सक्रिय हैं और डीएपी-यूरिया की पांच गुना कीमत वसूल रहे हैं। जिम्मेदार विभाग खामोश है। ऐसे में किसानों का धैर्य अब टूटने के कगार पर है और आंदोलन की चिंगारी तेज होती जा रही है।
खेतों में इंतजार, बाजार में लूट का खेल।
प्रदेश किसान विकास महासंघ के प्रांताध्यक्ष विद्या सागर सिंह ने कहा –
“प्रतापपुर क्षेत्र की सभी सोसायटियां खाली हैं। किसान रोज सोसायटी के चक्कर काट रहे हैं लेकिन उन्हें सिर्फ मायूसी मिल रही है। दूसरी ओर दुकानदार खुलेआम कालाबाजारी कर रहे हैं और कृषि विभाग आंख बंद किए तमाशा देख रहा है।”नेताओं ने साधा प्रशासन पर निशाना

नेताओं ने साधा प्रशासन पर निशाना
वरिष्ठ नेताओं नवीन जायसवाल, त्रिभुवन सिंह, ज्वाला सिंह, छतरू राम, रामचंद्र पोया, मंगल सिंह, बृजलाल विश्वकर्मा, मानेश्वर राजवाड़े, मयंक जायसवाल, भैया लाल पैकरा, शिवकुमार जायसवाल, सुमेर सिंह और श्याम लाल ने संयुक्त बयान जारी किया।
उन्होंने कहा –
“किसानों की जेब पर डाका डाला जा रहा है। सरकारी गोदामों में खाद नहीं और विभाग चुप्पी साधे बैठा है। यदि हालात नहीं सुधरे तो प्रतापपुर की धरती पर बड़ा आंदोलन खड़ा होगा।”
सवालों के घेरे में विभाग
क्या विभाग को खाद संकट की जानकारी नहीं?
या फिर मिलीभगत से चल रहा है यह खेल?
अब तक किसी व्यापारी पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
इन सवालों ने विभाग और प्रशासन दोनों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
किसानों की चेतावनी – आंदोलन तय
प्रदेश किसान विकास महासंघ ने साफ चेतावनी दी –
“यदि किसानों को शासकीय दर पर तत्काल खाद उपलब्ध नहीं कराया गया, तो जिले भर में उग्र आंदोलन होगा।”
किसानों का कहना है कि उनके सब्र का बांध टूट चुका है। अगर सरकार और विभाग अब भी चुप रहे तो हजारों किसान सड़कों पर उतरेंगे।
साज़िश या लापरवाही?
प्रतापपुर की धरती पर खाद संकट अब महज़ एक “समस्या” नहीं बल्कि “साज़िश” की तरह नजर आ रहा है। प्रशासन की खामोशी ने किसानों के गुस्से को और भड़का दिया है। अब बड़ा सवाल यही है – क्या प्रशासन नींद से जागेगा, या फिर किसानों का आंदोलन इस बार सत्ता-व्यवस्था को झुलसा देगा?




