परिवहन के अभाव में मोखा धान खरीदी केंद्र पर उठाव ठप, किसानों में बढ़ता आक्रोश

बालोद/गुरुर, अमित कुमार मंडावी
बालोद जिले के गुरूर तहसील क्षेत्र अंतर्गत मोखा धान खरीदी केंद्र में परिवहन व्यवस्था के अभाव के कारण धान का उठाव पूरी तरह प्रभावित हो गया है। समय पर उठाव नहीं होने से खरीदी केंद्र में धान का भारी जाम लग गया है, जिससे आसपास के गांवों के किसानों को गंभीर परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
जानकारी के अनुसार मोखा धान खरीदी केंद्र से जुड़े पांच पंचायतों के करीब दस गांवों के किसानों का अब तक आधा से अधिक धान खरीदा जाना शेष है। इसके बावजूद शासन द्वारा धान खरीदी की अंतिम तिथि निर्धारित कर दी गई है। समय सीमा समाप्त होने की आशंका के बीच खरीदी और उठाव में हो रही देरी से किसानों में भारी आक्रोश व्याप्त है।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ को उसकी उपजाऊ मिट्टी और भरपूर उत्पादन के कारण “धान का कटोरा” कहा जाता है। यहां की अधिकांश आबादी की आजीविका कृषि, विशेषकर धान की खेती पर निर्भर है। सावन माह में धान की बुआई और कार्तिक माह में कटाई के बाद किसान अपनी उपज को बेचकर रबी फसल की तैयारी करते हैं। वर्तमान में पौष माह चल रहा है और अधिकांश किसानों की फसल पूरी तरह कट चुकी है।
छह महीने तक कड़ी मेहनत और पसीना बहाने के बाद भी जब किसानों का धान समय पर नहीं बिक पा रहा है, तो उनके सामने आर्थिक संकट गहराता जा रहा है। धान खरीदी में तकनीकी गड़बड़ियां और उठाव में देरी के कारण किसान न तो अपनी उपज का भुगतान प्राप्त कर पा रहे हैं और न ही समय पर रबी फसल की बुआई की तैयारी कर पा रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि कई किसानों के घरों में बेटियों के विवाह की तैयारी चल रही है, वहीं कर्जदाता आए दिन भुगतान के लिए दबाव बना रहे हैं। ऐसे में धान का भुगतान अटकने से किसानों की परेशानी और बढ़ गई है। अन्नदाता किसान, जो पूरे समाज के लिए भोजन उपजाता है, आज स्वयं अपने हक के लिए भटकने को मजबूर है।
किसानों ने प्रशासन से मांग की है कि परिवहन व्यवस्था तत्काल दुरुस्त की जाए, धान का शीघ्र उठाव कराया जाए और खरीदी की अवधि बढ़ाई जाए, ताकि सभी किसानों का धान समय पर खरीदा जा सके। किसानों का कहना है कि यदि समय रहते समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो आंदोलन की स्थिति भी बन सकती है।
बुजुर्गों की कहावत को याद करते हुए किसानों ने कहा कि “समय पर हल न चले तो फसल नहीं मिलती, और समय पर न्याय न मिले तो किसान टूट जाता है।” अब देखना यह है कि शासन-प्रशासन किसानों की इस गंभीर समस्या पर कब और क्या ठोस कदम उठाता है।



