तहसील में नामांतरण विवाद ने मचाई हलचल: प्रशासन की सफाई से नहीं बुझी जनता की प्यास

सूरजपुर, 6 जून 2025।
छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले की भटगांव तहसील एक बार फिर विवाद के केंद्र में है। चुनगड़ी गांव से जुड़े फौती नामांतरण के दो मामलों ने राजस्व विभाग की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को कठघरे में ला खड़ा किया है। आरोप हैं कि राजस्व अमले की मिलीभगत से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पुश्तैनी जमीन हड़पी गई, जबकि तहसीलदार कार्यालय द्वारा इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए वीडियो बयान और लिखित खंडन जारी किया गया है। बावजूद इसके, सवाल जस के तस हैं – क्या यह खंडन सच्चाई है या सिर्फ़ एक और प्रशासनिक कवायद?

विवाद की जड़: नामांतरण की प्रक्रिया या उसका अनुपालन?
ग्राम चुनगड़ी निवासी रामशरण और कुछ अन्य ग्रामीणों ने तहसीलदार कार्यालय भटगांव पर गंभीर आरोप लगाए हैं कि—
मृतक फेकू राम और धनस्वरूप के नामांतरण में फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया गया।
संबंधित ग्राम पंचायत में इश्तिहार (अधिसूचना) न तो चस्पा किया गया, न ही उसमें तिथि या अधिकारी का हस्ताक्षर मौजूद था।
शिकायतकर्ता का दावा है कि इस प्रक्रिया में भूमाफिया और पटवारी स्तर पर सांठगांठ हुई, जिससे पुश्तैनी जमीन कब्जा ली गई।
यह मामला तब चर्चा में आया जब एक स्थानीय न्यूज़ चैनल CGN 24 ने इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया।


राजस्व विभाग का पक्ष: “सब कुछ नियम के तहत”
तहसीलदार कार्यालय, भटगांव ने मामले में 5 जून को लिखित खंडन जारी किया जिसमें दो प्रमुख मामलों की प्रक्रिया स्पष्ट की गई:
1.
फेकू राम के वारिसों का नामांतरण (23 फरवरी 2024 को आवेदन)
रामकिसुन सारथी द्वारा आवेदन किया गया।
भुइंया पोर्टल पर अपलोड एवं चुनगड़ी ग्राम में इश्तिहार चस्पा किया गया।
कोई आपत्ति न आने पर 18 मार्च 2024 को रामकिसुन, मुनिया और राजमनिया के नाम नामांतरण आदेश पारित हुआ।
2.
धनस्वरूप के वारिसों का नामांतरण (31 मई 2024 को आदेश)
सहसराम द्वारा आवेदन किया गया।
वारिसों – जुगमेन, सहसराम, अरतराम, सुनीलाल और लीलावती – के नाम संपत्ति दर्ज की गई।
तहसीलदार के अनुसार, पटवारी रिपोर्ट, दस्तावेज सत्यापन और प्रक्रिया के सभी चरण पूरे किए गए।

लेकिन कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं…
क्या इश्तिहार वास्तव में ग्राम पंचायत में चस्पा किया गया था?
जब वर्तमान सरपंच और शिकायतकर्ता स्थलीय सत्यापन से इनकार कर रहे हैं, तो क्या इसका कोई रिकॉर्ड वीडियो या दस्तावेजी प्रमाण मौजूद है?
अगर प्रक्रिया पारदर्शी थी, तो न्यायालय की शरण क्यों लेनी पड़ी?
लोक सेवा गारंटी अधिनियम के तहत जब समयबद्ध न्याय की बात की जाती है, तो फिर मामलों में इतनी प्रक्रिया संबंधी अस्पष्टता क्यों?
राजस्व अमले पर भरोसा क्यों टूट रहा है?
यह पहली बार नहीं है जब फर्जी दस्तावेजों पर नामांतरण के आरोप लगे हैं। पूर्व के मामलों की तरह इस बार भी जनता के मन में यह प्रश्न है कि—क्या प्रशासनिक जवाबदेही महज कागज़ी दस्तावेजों तक सीमित है?
खंडन नहीं, समाधान चाहिए
तहसील कार्यालय की सफाई प्रशासनिक रूप से पर्याप्त मानी जा सकती है, लेकिन यह जनता का विश्वास बहाल करने के लिए काफी नहीं है। यह विवाद सिर्फ़ एक गांव या दो मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे जिले में राजस्व प्रक्रिया की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक व्यापक चिंता को रेखांकित करता है।
यदि शिकायतकर्ता के आरोप निराधार हैं, तो निष्पक्ष जांच के माध्यम से इसे उजागर किया जाए। वहीं, यदि प्रशासनिक स्तर पर चूक हुई है, तो दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग अनदेखी नहीं की जा सकती।
अब निगाहें जिला प्रशासन पर
ग्रामीणों की निगाहें अब सूरजपुर जिला प्रशासन पर टिकी हैं। क्या यह विवाद न्यायिक निष्पक्षता के जरिए हल होगा या फिर और कई मामलों की तरह यह भी “फाइलों” और “खंडनों” के नीचे दब जाएगा? यह वक्त बताएगा।
📌 विशेष टिप्पणी
“राजस्व प्रक्रिया केवल आदेशों और खंडनों से नहीं चलती – इसका न्यायसंगत निष्पादन ही जनता में विश्वास बनाए रख सकता है।”



