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11 हजार वोल्ट का करंट: युवक झुलसा, बिजली विभाग की लापरवाही से जन आक्रोश

छत्तीसगढ़, सूरजपुर | तारीख: 25 मई 2025

हादसे की गूंज: 11 हज़ार वोल्ट का कहर, ज़िम्मेदार ‘ग़ायब’

शनिवार की दोपहर सूरजपुर जिले के सरना पारा में एक दर्दनाक हादसा पेश आया, जिसने बिजली विभाग की कार्यशैली और जवाबदेही पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। आरडीएसएस प्रोजेक्ट के अंतर्गत कार्य कर रहे एक मजदूर को 11,000 वोल्ट की हाई टेंशन लाइन ने अपनी चपेट में ले लिया। वह बुरी तरह झुलस गया है और सूरजपुर जिला अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहा है।

कैसे हुआ हादसा?

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, आरडीएसएस (Revamped Distribution Sector Scheme) प्रोजेक्ट के तहत बिजली लाइन सुधार और बिछाने का कार्य एक बाहरी ठेकेदार कंपनी द्वारा कराया जा रहा था। लेकिन न सुरक्षा उपकरण थे, न किसी अधिकारी की निगरानी। हाई वोल्टेज लाइन चालू थी — बावजूद इसके मजदूरों से काम करवाया गया।

प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि पीड़ित मजदूर जैसे ही खंभे के पास गया, करंट की चपेट में आ गया। मौके पर न कोई सुरक्षा हेलमेट था, न इंसुलेटेड उपकरण — और न ही लाइन बंद कराई गई थी। यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि एक लापरवाही से गढ़ी गई त्रासदी है।

कहाँ हैं ज़िम्मेदार अफसर?

स्थानीय लोगों और पत्रकारों ने सूरजपुर विद्युत विभाग (परियोजना) के कनिष्ठ अभियंता सादफ़ अहमद और लाइनमैन जी.एन. तिवारी पर सीधा आरोप लगाया है कि उनकी गैरमौजूदगी और लापरवाही के चलते यह दुर्घटना हुई। यह कोई पहला मामला नहीं है — पूर्व में भी इन दोनों के खिलाफ शिकायतें हो चुकी हैं।

लोगों का आरोप है कि इन अधिकारियों का अधिकतर समय “घर” या “ठेकेदारों के दफ्तर” में बीतता है, न कि कार्यस्थल पर।

करोड़ों का प्रोजेक्ट, ज़ीरो निगरानी

आरडीएसएस योजना के तहत करोड़ों रुपए का बजट खर्च हो रहा है। उद्देश्य था – ग्रामीण इलाकों में बेहतर बिजली आपूर्ति और संरचना। लेकिन धरातल पर तस्वीर अलग है:

कोई सुरक्षा मानक लागू नहीं।

ठेकेदारों पर विभागीय नियंत्रण नहीं।

अधिकारी मौके से अक्सर नदारद।

शिकायतों का ढेर, कार्रवाई शून्य

बिजली विभाग के उच्च अधिकारियों को पूर्व में कई बार लिखित और मौखिक शिकायतें दी गईं। प्रबंध निदेशक भीम सिंह कंवर को भी पत्र भेजे गए, लेकिन न कोई विभागीय जांच बैठाई गई, न जिम्मेदारों का तबादला हुआ।

ईएसआईसी/ईपीएफ घोटाले में फंसे अधीक्षण अभियंता राजेश लकड़ा का मामला भी इसी विभाग का काला अध्याय है। FIR होने के बाद भी उन्हें बैकुंठपुर जैसे महत्त्वपूर्ण पद पर बनाए रखा गया।

‘घर के पास पोस्टिंग’ – क्या यह संयोग है?

जनता का यह सवाल भी उठ रहा है कि कनिष्ठ अभियंता सादफ़ अहमद की पोस्टिंग उनके खुद के गाँव, घर से मात्र 500 मीटर दूरी पर क्यों की गई? क्या यह सिर्फ विभागीय सुविधा है, या किसी ‘ऊँची पहुँच’ का असर?

प्रशासन और पुलिस – ‘मौन समर्थन’?

हादसे के बाद न कोई वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचा, न पुलिस ने FIR दर्ज की। इससे जन आक्रोश और भी गहरा हो गया है। क्या यह चुप्पी सिर्फ अकर्मण्यता है, या फिर ठेकेदार-अधिकारी गठजोड़ का परिणाम?

जन आक्रोश: “हमारी जान की कीमत क्या एक कागज़ है?”

गांववालों और सामाजिक संगठनों का गुस्सा फूट पड़ा है। उनका कहना है:

“अगर एक अफसर की कार में स्क्रैच लग जाए, तो जांच बैठती है। लेकिन एक गरीब मजदूर झुलस गया, तो सब चुप क्यों हैं?”

“क्या गरीबों की जान की कीमत सिर्फ एक ठेके की फाइल है?”

जनता की मांगें – न्याय चाहिए, सिर्फ मुआवज़ा नहीं

कनिष्ठ अभियंता सादफ़ अहमद और लाइनमैन जी.एन. तिवारी को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए।

ठेकेदार और कार्यरत कंपनी पर आपराधिक मामला दर्ज हो।

पूरे आरडीएसएस प्रोजेक्ट की स्वतंत्र और न्यायिक जांच कराई जाए।

ज़िम्मेदार अफसरों की चल-अचल संपत्ति की जांच हो।

पीड़ित मजदूर को समुचित मुआवज़ा और सरकारी सहायता दी जाए।

निष्कर्ष: एक सिस्टम जो गरीब की चीख नहीं सुनता

यह हादसा एक चेतावनी है — एक ऐसे सिस्टम की जो ठेकेदारों और अधिकारियों की जेबें भरता है, लेकिन जमीनी स्तर पर जानलेवा लापरवाही का अड्डा बन गया है। सवाल यह नहीं है कि हादसा कैसे हुआ, बल्कि यह है कि कब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे और अफसर-ठेकेदार बचते रहेंगे?

“अगर अब भी कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो अगली बिजली सिर्फ खंभे पर नहीं, व्यवस्था पर गिरेगी।” – एक स्थानीय बुज़ुर्ग

Bharat Samman

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