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मजनू बना थाना प्रभारी! महिला अधिकारी के आवास में पति ने पकड़ा रंगेहाथ, पुलिस पर आरोपों की बौछार

अंबिकापुर, 12 जून 2025।

एक सनसनीखेज मामला सामने आया है जिसने पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली और आचरण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि मणिपुर थाने के प्रभारी उपनिरीक्षक अखिलेश सिंह एक महिला अधिकारी के सरकारी आवास में संदिग्ध परिस्थितियों में पकड़े गए। महिला अधिकारी के पति ने उन्हें “बंधक” बनाकर रंगेहाथ पकड़ने का दावा किया है। यह घटना सिर्फ़ व्यक्तिगत चरित्र पर नहीं, बल्कि पूरे पुलिस तंत्र की साख पर चोट करती प्रतीत हो रही है।

घटना का विवरण:

घटना अंबिकापुर के एक सरकारी आवास की है जहाँ एक महिला अधिकारी रहती हैं। महिला के पति ने आरोप लगाया कि जब वे अचानक अपने सरकारी आवास पहुँचे, तो वहाँ खड़ी एक निजी कार (CG 04 MA 9996) ने उनका ध्यान खींचा। यह गाड़ी मणिपुर थाना प्रभारी अखिलेश सिंह की बताई जा रही है। पति ने बताया कि आवास का दरवाजा अंदर से बंद था और उन्हें भीतर से कोई जवाब नहीं मिल रहा था।

कई बार दस्तक देने के बावजूद दरवाजा नहीं खुला तो उन्होंने तत्काल 112 पर कॉल कर पुलिस को बुलाया। थोड़ी देर में गांधी नगर थाना प्रभारी गौरव पांडेय मौके पर पहुँचे, पर दरवाजा खुलवाने की कोशिश नाकाम रही। इसके बाद कोतवाली थाना प्रभारी मनीष सिंह परिहार भी पहुँचे, लेकिन पीड़ित का आरोप है कि उसे बातों में उलझाकर रख दिया गया और इस बीच महिला अधिकारी और अखिलेश सिंह बाहर निकलकर निकल गए।

सबूत मिटाने की कोशिश?

पति ने आरोप लगाया कि जब उन्होंने बाहर खड़ी गाड़ी को जब्त करने की माँग की तो एक आरक्षक ने वाहन को वहां से हटा दिया। इस बीच सारे सबूत मिटा दिए गए। इसके बाद जब उन्होंने गांधीनगर थाना में शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की, तो कोतवाली प्रभारी मनीष सिंह परिहार ने कथित तौर पर कहा:

“कौन अखिलेश सिंह? कौन-सी गाड़ी? जाओ कोर्ट में मुकदमा करो।”

पुलिस अधीक्षक की प्रतिक्रिया:

मामला सोशल मीडिया और स्थानीय पत्रकारों के माध्यम से जैसे ही तूल पकड़ने लगा, वैसे ही पुलिस अधीक्षक राजेश कुमार अग्रवाल ने इस पर संज्ञान लिया और कहा:

“मामला संज्ञान में लिया गया है। जांच के बाद कार्रवाई की जाएगी।”

हालांकि पीड़ित पति का कहना है कि धारा 155 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर उन्हें सिर्फ़ न्यायालय जाने की सलाह दी गई है।

सवालों के घेरे में पुलिस:

क्या एक थाना प्रभारी बिना आधिकारिक कार्य के किसी महिला अधिकारी के आवास में देर रात रह सकता है?

क्या पुलिस अधिकारियों की मिलीभगत से सबूत मिटाए गए?

क्या यह केवल नैतिक भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि पद का दुरुपयोग भी है?

क्या पीड़ित पति की शिकायत को दबाने का प्रयास किया गया?

निष्कर्ष:

यह घटना केवल एक व्यक्तिगत विवाद नहीं है, बल्कि इसमें पुलिस विभाग की छवि, निष्पक्षता और नैतिकता दाँव पर है। जब पुलिस अधिकारी ही संदिग्ध भूमिका में पाए जाएँ और उनके विरुद्ध कार्रवाई की बजाय आरोप लगाने वाले को ही ‘कोर्ट में जाने’ की सलाह दी जाए, तो न्याय की उम्मीद करना एक आम नागरिक के लिए किसी दुस्वप्न जैसा है।

अब देखने वाली बात यह होगी कि पुलिस अधीक्षक राजेश कुमार अग्रवाल की ‘जांच’ कितनी निष्पक्ष और पारदर्शी होती है — या फिर यह मामला भी ‘सामूहिक मौन’ और ‘आंतरिक सांठगांठ’ की भेंट चढ़ जाएगा।

Bharat Samman

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