विशेष रिपोर्ट : पैलेस में शफी अहमद का सफ़र – 30 साल बेमिसाल या सवालों के घेरे में?

सरगुजा। भारत सम्मान
नगर निगम के पूर्व पीडब्ल्यूडी एमआईसी सदस्य और कांग्रेस नेता शफी अहमद का नाम सरगुजा की राजनीति में हमेशा चर्चा में रहा है। उनकी पहचान एक शालीन, मृदुभाषी और मिलनसार नेता की रही है, लेकिन साथ ही उन पर कई सवाल भी खड़े होते रहे हैं। यह लेख असिस्टेंट प्रोफेसर अकिल अहमद अंसारी, अम्बिकापुर के फेसबुक वाल से लिया गया है।
बदहाल सड़कों पर गुस्सा
इन दिनों सरगुजा की जनता सड़कों की बदहाली को लेकर गुस्से में है। लोग सोशल मीडिया पर कभी अपशब्दों का प्रयोग कर रहे हैं तो कोई सड़क के गड्ढों में लोटकर वीडियो बनाकर विरोध दर्ज करा रहा है। आरोप है कि निगम के पीडब्ल्यूडी प्रभारी रहते हुए शफी अहमद ने सड़कों के निर्माण में गंभीर लापरवाही बरती और ठेकेदारों-इंजीनियरों की मिलीभगत से करोड़ों का खेल हुआ।
पैलेस राजनीति में ‘खास’
शफी अहमद को टीएस सिंहदेव का बेहद करीबी माना जाता है। पैलेस राजनीति में कहा जाता है—
“ना खाता, ना बही, जो कहे शफी वही सही।”
यानी मुस्लिम समाज की राजनीति में उनकी हैसियत ‘फ्यूडल लॉर्ड’ जैसी है।
इतिहास में यह भूमिका पहले हाजी अब्दुल रशीद सिद्दीकी निभाते थे, जिन्हें एम.एस. सिंहदेव का सबसे करीबी माना जाता था। अब वही भूमिका शफी अहमद ने टीएस सिंहदेव के दौर में निभाई।
गुटबाजी और राजनीतिक लाभ
मुस्लिम राजनीति में अब दो गुट हैं — एक शफी गुट और दूसरा अब्दुल रशीद सिद्दीकी के बेटे इरफ़ान का गुट। इन दोनों के बीच लंबे समय से शीत युद्ध चल रहा है, जिसका राजनीतिक लाभ शफी अहमद को मिलता रहा। 1995 से अब तक उन्होंने कांग्रेस जिला महामंत्री से लेकर प्रदेश श्रम कल्याण बोर्ड अध्यक्ष तक का सफर तय किया।
महत्वाकांक्षा और चुनौतियाँ
अब शफी अहमद विधायक बनने की महत्वाकांक्षा रखते हैं। लेकिन पैलेस से उनकी दूरी बढ़ रही है। बताया जा रहा है कि उन्हें अब्दुल रशीद सिद्दीकी की तर्ज पर मार्गदर्शन मंडल में डालने की चर्चा चल रही है।
समाज के लिए योगदान या व्यक्तिगत लाभ?
शफी अहमद पर आरोप है कि उन्होंने मुस्लिम समुदाय की सामुदायिक जरूरतों — जैसे स्कूल, सामुदायिक भवन, शादी घर, प्याऊ — के लिए कोई ठोस पहल नहीं की।
पूर्व नेता अब्दुल रशीद सिद्दीकी ने 1978 में सरगुजा नशाबंदी समिति बनाई थी, जबकि शफी अहमद के तीस साल की उपलब्धियों में यह तक देखने को मिला कि उनके मोहल्ले का एक युवक नशे में पैलेस से मूर्ति चुरा लेता है।
विरोधाभास का उदाहरण
जब नगर निगम ने अवैध निर्माण तोड़े, तब मुस्लिम समाज में आक्रोश था। लेकिन शफी अहमद अधिकारियों का ही पक्ष लेते नजर आए। यह रुख भी उन्हें आलोचना के घेरे में लाता है।
खूबियाँ भी कम नहीं
उनकी छवि एक शालीन, धैर्यवान और सक्रिय राजनेता की है। वे लोगों के निजी काम त्वरित निपटाते हैं और टीएस सिंहदेव समेत कांग्रेस के बड़े नेताओं से उनकी निकटता उन्हें अब तक मजबूत बनाए रखी है।
कुल मिलाकर, शफी अहमद का 30 साल का सफर राजनीति में बेमिसाल भी है और विवादास्पद भी। उनका भविष्य अब इस पर निर्भर करेगा कि वे पैलेस और जनता, दोनों का भरोसा कैसे बनाए रखते हैं।




