फीस नहीं जमा करने पर छात्र को परीक्षा से रोका, स्कूल प्रबंधन पर भेदभाव का आरोप, जांच अधर में

रामानुजगंज, बलरामपुर (छत्तीसगढ़), 22 मई 2025:
शिक्षा के मंदिर माने जाने वाले स्कूल में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है जहाँ फीस भुगतान में देरी के कारण एक छात्र को परीक्षा में बैठने से वंचित कर दिया गया। मामला विद्या निकेतन माध्यमिक स्कूल चांकी का है, जहाँ कक्षा 6वीं में अध्ययनरत छात्र को परीक्षा के समय कक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी गई। अब छात्र के पिता उपेन्द्र श्रीवास्तव ने जिला कलेक्टर को आवेदन देकर न्याय की गुहार लगाई है।
फीस भरने के बाद भी प्राचार्य ने प्रमाण पत्र देने से किया इंकार
आवेदक उपेन्द्र श्रीवास्तव के अनुसार, आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद उन्होंने अपने बेटे की पूरी स्कूल फीस समय पर जमा कर दी थी। इसके बावजूद स्कूल प्रबंधन ने परीक्षा के समय छात्र को “एब्सेंट” करार देते हुए उसकी उपस्थिति ही नकार दी। जब स्थानांतरण प्रमाण पत्र (टीसी) माँगा गया, तो स्कूल ने यह कहकर इंकार कर दिया कि छात्र परीक्षा में शामिल नहीं हुआ। देखें छात्र की उपस्थिति स्कूल ने ही जारी किया है।

शिक्षा विभाग की चुप्पी पर उठे सवाल
इस मामले में विकासखंड शिक्षा अधिकारी की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। आरोप है कि स्कूल प्रबंधन की मनमानी पर शिक्षा अधिकारी ने कोई स्पष्ट कार्रवाई नहीं की, जिससे स्कूल को मनमानी करने का अवसर मिल गया। यही नहीं, जिला कलेक्टर द्वारा जांच समिति गठित किए जाने के बावजूद जांच कार्यवाही अब तक ठंडे बस्ते में है।
पूरक परीक्षा की बात बनाकर कर रहे लीपापोती
अब जब मामला उजागर हुआ है, तो संबंधित अधिकारी छात्रों को पूरक परीक्षा में बैठाने का प्रस्ताव देकर मामले को शांत करने का प्रयास कर रहे हैं। अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल प्रशासन ने जानबूझकर छात्र को “फेल” घोषित करने की मानसिकता से कार्य किया, जबकि सरकार की स्पष्ट नीति है कि इस स्तर पर छात्रों को फेल नहीं किया जाना चाहिए।

न्याय की आस में परिवार
हिमांशु के पिता ने कहा, “मेरे बेटे का मनोबल टूट चुका है। हम जैसे मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं। यदि फीस नहीं दी होती तो बात समझ आती, लेकिन शुल्क भुगतान के बाद भी हमारे साथ अन्याय हुआ है।”
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जिला प्रशासन इस मामले में कब तक निष्पक्ष कार्यवाही करता है और दोषियों पर कब तक कार्रवाई होती है।
“इस प्रकार की घटनाएँ न केवल एक छात्र का भविष्य अंधकारमय करती हैं बल्कि समूची शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती हैं। ज़रूरत है सख़्त कार्यवाही की ताकि दोबारा किसी बच्चे के साथ ऐसा अन्याय न हो।”



