नारी… तुममें संसार है – डॉ. पिंकी गौड़

शब्द से परे कोई रचना होगी,
तो वो तुम होगी…
तुम होगी… नारी, तुम होगी…
तुम ही होगी,
सिर्फ तुम होगी।
कोख से उपज कर,
कोख को सृजित करने वाली सृजनकर्ता—
अगर कोई होगी,
तो वो सिर्फ तुम होगी…
सिर्फ तुम होगी।
दामन में प्रेम समाहित कर,
ममतामयी आँचल में नई दुनिया सहेजने वाली—
अगर कोई होगी,
तो वो तुम होगी…
सिर्फ तुम होगी।
अपनी आँखों के सपनों के रंगों से
दूजे के सपनों में रंग भरने वाली—
अगर कोई होगी,
तो वो तुम होगी…
सिर्फ तुम होगी।
एक नहीं, दो-दो घरों को
अपने धैर्य के रंग से
अलंकृत करने वाली—
अगर कोई होगी,
तो वो तुम होगी…
सिर्फ तुम होगी।
अपने बचपन की चौखट के आगे आकर
एक नई चौखट बना देने वाली—
अगर कोई होगी,
तो वो तुम होगी…
सिर्फ तुम होगी।
पर इक सवाल उमड़ता है जेहन में—
संस्कार बनाने वाली
संस्कार-विहीन हो गई
क्यों और कैसे?
मुंह छिपाकर, रात के अंधेरे में
अपनी ममता को झूला घरों में कलपते छोड़ गई—
क्यों और कैसे?
अपनी कोख की कोमल नवांकुरित को
समय से पहले बड़ा बना गई—
क्यों और कैसे?
पूछती हूँ उन माताओं से…
खुद माँ होकर
एक माँ को घर से बेघर कर गई—
क्यों और कैसे?
बूढ़ी हड्डियों की चरमराहट में
तुम्हें दर्द की सदा सुनाई नहीं दी—
क्यों और कैसे?
बुझती आँखों की रोशनी में
तुम्हें अपनी छवि नज़र नहीं आई—
क्यों और कैसे?
एक सदा तो आई होगी…
मन डगमगाया तो होगा…
चलो, एक बार खुद को माफ़ कर दो,
फिर पिरोकर नए कुसुमों की माला
सुवासित कर दो इस जहाँ को…
रचनाकार:
डॉ. पिंकी गौड़, साहित्यकार एवं शिक्षिका, बिलासपुर




