कोरिया जिले में वन विभाग की बुलडोजर कार्रवाई: बारिश के बीच तीसरे दिन भी ग्रामीणों के घर उजाड़े जा रहे, जनप्रतिनिधि मौन

कोरिया/सोनहत, 23 जून 2025 । शब्बीर मोमिन
कोरिया जिले के सोनहत मुख्यालय और आसपास के ग्रामीण इलाकों में वन विभाग की ताबड़तोड़ बुलडोजर कार्रवाई से लोग भय और आक्रोश के माहौल में जीने को मजबूर हैं। देवगढ़ रेंज के अंतर्गत आने वाले ओदारी, कुशहा, कुशमहां, पाराडोल समेत अन्य गांवों में आज लगातार तीसरे दिन आठ बुलडोजरों की मदद से ग्रामीणों के घर, खेत और पक्के मकानों को तोड़ा जा रहा है।

विधायक और जनप्रतिनिधियों से लगाई गुहार, लेकिन जवाब नहीं
पीड़ित ग्रामीणों ने स्थानीय विधायक और जनप्रतिनिधियों से मदद की गुहार लगाई, लेकिन कहीं से कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला। स्थानीय जनप्रतिनिधि ग्रामीणों को रामा (नुजनगर) विधायक के पास जाने की सलाह दे रहे हैं, जबकि विधायक तक बात पहुंचे भी तो अब तक कोई हस्तक्षेप नहीं किया गया है।
क्या बुलडोजर कार्रवाई की जानकारी विधायक को नहीं है?
सूत्रों के अनुसार विधायक को वन विभाग की इस कार्रवाई की पूरी जानकारी है, बावजूद इसके वे अब तक चुप्पी साधे हुए हैं। क्षेत्रीय नेता और जनप्रतिनिधि भी इस संवेदनशील मुद्दे पर कोई स्पष्ट रुख नहीं ले पा रहे हैं।

मूसलधार बारिश में उजड़ते घर, बेघर होते लोग
इलाके में बीते पांच दिनों से लगातार बारिश हो रही है। ऐसे में लोग अपने घरों को पानी से बचाने की जद्दोजहद में लगे थे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि उनका आशियाना ही सरकार उजाड़ देगी। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन ने न तो उन्हें नोटिस दिया और न ही पुनर्वास की कोई व्यवस्था की।
एक साथ आठ बुलडोजरों का उपयोग — न्यायिक हस्तक्षेप से बचने की रणनीति?
ग्रामीणों का आरोप है कि वन विभाग ने एक साथ आठ बुलडोजरों को कार्रवाई में झोंक दिया ताकि लोगों को कोर्ट की शरण लेने का मौका ही न मिल सके। इतना ही नहीं, तेज बारिश के बीच लोगों को कहीं और आश्रय लेने का भी कोई विकल्प नहीं दिया गया।

सोशल मीडिया पर नेताओं की जंग, ग्रामीणों की कोई सुनवाई नहीं
एक तरफ गांवों में लोग बेघर हो रहे हैं, वहीं राजनीतिक कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर एक-दूसरे की पार्टियों की नीतियों और कमियों को लेकर बहस में उलझे हैं। दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता अपनी-अपनी पार्टियों के बचाव में लगे हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि बेघर हुए ग्रामीण अब यह समझने लगे हैं कि राजनीति केवल चुनावी वक्त पर उनका इस्तेमाल करना जानती है।
ग्रामीणों की गुहार: “कोई तो सुनो हमारी बात”
ग्रामीणों ने मीडिया और प्रशासन से अपील की है कि इस कार्रवाई को रोका जाए और उन्हें स्थायी वैकल्पिक आश्रय मुहैया कराया जाए। इस समय उनकी सबसे बड़ी ज़रूरत एक सुरक्षित सिर छुपाने की जगह है।
यह मसला न केवल मानवीय संवेदना का है, बल्कि प्रशासनिक रवैये और राजनैतिक जिम्मेदारी पर भी सवाल उठाता है। कोरिया जिले की यह तस्वीर बताती है कि विकास और वन संरक्षण के नाम पर अगर आम आदमी की बुनियादी ज़रूरतें ही कुचली जाएँगी, तो लोकतंत्र की ज़मीन पर गहराते अविश्वास को कौन रोकेगा?




