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कहने को जीवनदायिनी है एम्बुलेंस, पर ज़मीनी हकीकत में सवाल ही सवाल

अनूपपुर | मदन मोहन मिश्रा

मेडिकल इमरजेंसी के समय आम नागरिक को त्वरित और भरोसेमंद सहायता मिले—इसी उद्देश्य से मध्य प्रदेश शासन ने पूर्व मुख्यमंत्री माननीय शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में कई महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू की थीं। इनमें 108 एम्बुलेंस सेवा, जननी सेवा और अन्य आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधाएं शामिल थीं, जिन्हें प्रदेश की “जीवनरेखा” कहा गया।

लेकिन आज सवाल यह उठता है कि—
क्या वही सेवाएं अनूपपुर जिले में उसी भावना और ईमानदारी से संचालित हो रही हैं?

योजना अच्छी, लेकिन क्रियान्वयन सवालों के घेरे में

काग़ज़ों में भले ही 108 एम्बुलेंस सेवा और अन्य स्वास्थ्य योजनाएं सक्रिय दिखती हों, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। गंभीर स्थिति में मरीज को समय पर अस्पताल पहुँचाने वाली यह सेवा कहीं न कहीं अधिकारियों की मनमानी और निजी हितों की भेंट चढ़ती दिखाई दे रही है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार एम्बुलेंस समय पर नहीं पहुँचती, तो कई मामलों में निजी एम्बुलेंस को सरकारी सेवा के नाम पर चलाया जा रहा है, जिससे न केवल शासन की मंशा पर सवाल उठते हैं, बल्कि आम जनता का भरोसा भी टूटता है।

शारदा मेडिकल इंफ्रा के नाम से संचालन, पारदर्शिता गायब

सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि शारदा मेडिकल इंफ्रा के नाम पर जिले में एम्बुलेंस सेवाओं का संचालन किया जा रहा है, लेकिन—
• इन एम्बुलेंसों की वास्तविक संख्या कितनी है?
• कौन-कौन सी एम्बुलेंस सरकारी हैं और कौन निजी?
• चालक, ईएमटी और संचालन की जिम्मेदारी किनके हाथ में है?
• क्या सभी एम्बुलेंस शासन के तय मानकों पर खरी उतरती हैं?

इन सवालों के स्पष्ट जवाब आज तक सामने नहीं आ सके हैं।

“रविंद्र” जैसे लोग क्यों बेलगाम?

जिले में एम्बुलेंस संचालन से जुड़े कुछ नाम लगातार चर्चा में हैं। रविंद्र जैसे लोग, जो खुद को किसी “माननीय” का करीबी या अधिकारी बताकर अपनी निजी एम्बुलेंस को सरकारी सेवा की तरह संचालित करते बताए जा रहे हैं, आखिर उन्हें यह अधिकार किसने दिया?
• किस सक्षम अधिकारी ने इन्हें जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था से खेलने की छूट दी?
• क्या यह सब प्रशासनिक संरक्षण के बिना संभव है?
• और यदि नहीं, तो जिम्मेदार अधिकारी अब तक चुप क्यों हैं?

यह मामला अब केवल अव्यवस्था का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं के साथ खुले खिलवाड़ का बनता जा रहा है।

स्वास्थ्य सेवा या तमाशा?

एम्बुलेंस सेवा कोई साधारण सुविधा नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच का फर्क होती है। ऐसे में यदि इसमें लापरवाही, निजीकरण और मनमानी हावी हो जाए, तो इसका सीधा असर आम नागरिक की जान पर पड़ता है।

सबसे गंभीर सवाल यह है कि—
इन जिम्मेदार अधिकारियों को आखिर किसका अभयदान प्राप्त है?
क्यों न तो जिला प्रशासन सख्त कार्रवाई करता है और न ही स्वास्थ्य विभाग पारदर्शिता दिखाता है?

अगली कड़ी में होंगे बड़े खुलासे

यह रिपोर्ट केवल शुरुआत है।
अगले अध्याय में—
• जिले की हर एम्बुलेंस का पूरा डेटा,
• संचालन से जुड़े उच्च अधिकारियों से हुई बातचीत,
• और सेवा में पाई गई अनियमितताओं के ठोस तथ्य
जनता के सामने रखे जाएंगे।

जीवन बचाने के नाम पर अगर व्यवस्था ही बीमार हो जाए,
तो सवाल पूछना पत्रकार का फ़र्ज़ है। अब देखना यह है कि अनूपपुर प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इन सवालों का जवाब देता है—या फिर चुप्पी को ही अपनी नीति बनाए रखता है।

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